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शिक्षा में सृजनशीलता का प्रश्न और मौजूदा व्यवस्था भाग 7

शिक्षा में सृजनशीलता का प्रश्न और मौजूदा व्यवस्था पर महेश चन्द्र पुनेठा का यह लेख किश्तों में प्रकाशित किया जा रह है, श्री पुनेठा मूल रूप से शिक्षक है, और रचनात्मक शिक्षक मंडल के माध्यम से शिक्षा के सवालो को उठाते रहते है । इनका आलोक प्रकाशन, इलाहाबाद द्वारा ”  भय अतल में ” नाम से एक कविता संग्रह  प्रकाशित हुआ है । श्री पुनेठा साहित्यिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों द्वारा जन चेतना के विकास कार्य में गहरी अभिरूचि रखते है । देश के अलग अलग कोने से प्रकाशित हो रही साहित्यिक पत्र पत्रिकाओ में उनके 100 से अधिक लेख, कविताए प्रकाशित हो चुके है ।

शिक्षा में सृजनशीलता का प्रश्न और मौजूदा व्यवस्था भाग 7

महेश चन्द्र पुनेठा

शिक्षा आर्थिक उदारीकरण के ऐजेंडे को लागू करने का माध्यम बन चुकी है। उसके द्वारा आर्थिक उदारीकरण के पक्ष में माहौल तैयार करने का काम किया जा रहा है। ऐसा ही करने पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हित हैं। आज उच्च शिक्षा में विदेशी विश्वविद्यालय को आने की अनुमति दे दी गई है, वह दिन दूर नहीं जब कोई बहुराष्ट्रीय कंपनी पूरे देश में हर स्तर पर शिक्षा देने का काम अपने हाथ में ले लेगी। तब देश की संप्रभुता और संस्कृति का क्या हाल होगा, समझा जा सकता है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारी ’लोककल्याणकारी, समाजवादी तथा लोकतांत्रिक सरकारें‘ इसी शिक्षा की पैरोकार हैं। आजादी के बाद से लेकर आज तक चल रही दोहरी शिक्षा जो आज बहुपरती शिक्षा में बदल गयी है, इसी का परिणाम है। सरकार की जनता के पैंसों से विद्यालयों का आधारभूत ढाँचा विकसित कर प्रबंधन के नाम पर उन्हें निजी हाथों को देने की योजना बन चुकी है। विभिन्न राज्यों में सरकारी प्राथमिक विद्यालयों को ’सार्वजनिक-निजी साझेदारी‘ के अंतर्गत किसी काॅरपोरेट,स्वयंसेवी संगठन,स्वयं सहायता समूह, व्यक्ति और समुदाय आधारित संगठनों को सौंपा जाना प्रारम्भ हो गया है। भविष्य में इस भागीदारी का और बढ़ना निश्चित है।

शिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 ने तो रही सही कसर भी पूरी कर दी है। इस अधिनियम में ऐसे कुछ प्रावधान हैं जो शिक्षा के निजीकरण को खुला प्रोत्साहन देतेे हैं। निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत गरीब-वंचित तबके के बच्चों को वाउचर प्रदान कर भेजने की योजना इसका एक उदाहरण है। इस प्रावधान से आने वाले समय में सरकारें नये विद्यालय खोलने के अपने दायित्व से बच जाएंगी। साथ ही इस मान्यता को भी अधिक बल मिलेगा कि निजी स्कूल सरकारी स्कूलों से बेहतर होते हैं।

कैसी विडंबना है कि सरकार को अपने ही विद्यालयों पर विश्वास नहीं रह गया है। सरकार सरकारी स्कूलों की शैक्षिक गुणवत्ता को बढ़ाने की अपेक्षा जनता को निजी विद्यालयों की ओर जाने को प्रोत्साहित कर रही है। होना तो यह चाहिए था कि सरकार को अपने बीमार विद्यालयों का इलाज कर निजी विद्यालयों में अध्ययनरत बच्चों को उस ओर आकर्षित करती। उनकी गुणवत्ता को इस स्तर तक उठाती कि सम्पन्न वर्ग के बच्चे भी उन विद्यालयों में प्रवेश लेने को उत्सुक हों। भले ही सरकार उस वर्ग के बच्चों से शुल्क वसूल करती। ऐसा करने से दोहरा लाभ हो सकता था-पहला, हर वर्ग के बच्चे एक समान स्कूल में पढ़ते जो समाज में वर्ग भेद को समाप्त करता। दूसरा, सरकारी विद्यालयों को चलाने के लिए आर्थिक संसाधन जुटाए जा सकते। यह कोई जरूरी नहीं है कि अमीर या उच्च मध्यवर्ग के बच्चों को भी निःशुल्क शिक्षा प्रदान की जाए। एक तरह से वाउचर योजना निजी क्षेत्र को लाभ पहँुचाने की योजना है। ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार धीरे-धीरे शिक्षा को निजी क्षेत्र के भरोसे छोड़ कर अपनी जिम्मेदारी से बचना चाहती है। आज सरकारी विद्यालयों में गरीब वर्ग के बच्चे ही आ रहे हैं और जिस दिन ये बच्चे भी वाउचर लेकर निजी स्कूलों में चले जाएंगे तब फिर सरकारी स्कूलों को बंद करने के सिवाय कोई अन्य उपाय नहीं रहेगा। जैसा कि यह सिलसिला शुरू भी हो गया है। इस तरह एक दिन शिक्षा पूरी तरह निजी हाथों में चली जाएगी और देशी-विदेशी व्यापारी शुद्ध लाभ के लिए शिक्षण संस्थाएं संचालित करने लगेंगे।

सोचा जा सकता है तब शिक्षा का उद्देश्य क्या रह जाएगा? शिक्षा में कितनी मूल्यों की बात रह जाएगी और कितनी जीवन की? तब शिक्षा का संबंध चेतना से नहीं रह जाएगा। शिक्षा जकड़न को तोड़े इसकी कोई जरूरत महसूस नहीं की जाएगी। बच्चों में विवेकशीलता का विकास शिक्षा का कोई सरोकार नहीं रह जाएगा क्योंकि बाजार की दृष्टि से इनकी कोई उपयोगिता नहीं है। जैसा कि हम अभी भी देख रहे हैं निजी स्वामित्व वाले शिक्षण संस्थानों में शिक्षा के नाम पर पाठ्चर्या में उन्हीं विषयों को शामिल किया जा रहा है जो उद्योगों के विस्तार और संचालन के लिए जरूरी है। वहाँ भाषा व मानविकी जैसे चेतना विकसित करने व व्यक्तित्व का पूर्ण विकास करने वाले विषयों की लगातार उपेक्षा की जा रही है। उनके स्थान पर प्रबंधन व तकनीकी विषयों को बढ़ावा दिया जा रहा है। बच्चा जो पढ़ना चाह रहा है उसे वह नहीं पढ़ने दिया जा रहा है बल्कि बाजार उसे जो पढ़ाना चाह रहा है उसे वह पढ़ना है। बच्चे की सृजनात्मकता और रूचि का कोई ध्यान नहीं रखा जा रहा है। बड़े-बड़े विज्ञापनों द्वारा छात्र-अभिभावकों का मन तैयार किया जा रहा है। उन्हें हसीन सपने दिखाए जा रहे हैं। इतने बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं कि उन्हें लगता है कि अमुक पाठ्यक्रम पढ़ने से उनकी किस्मत ही बदल जाएगी।

कुछ लोग तर्क देते हैं कि निजी विद्यालयों में 25 प्रतिशत स्थान निर्धन और वंचित बच्चों के लिए आरक्षित हो जाने के प्रावधान से अमीर और गरीब वर्ग के बीच खाई पाटने में सहायता मिलेगी। अब रिक्शा चालकों, सफाई कर्मियों, ठेले वालों, मजदूरों आदि के बच्चे साहबों और सेठ-साहूकारों के बच्चों के साथ बैठकर पढ़ेंगे लेकिन अब तक के अनुभव बताते हैं कि ऐसा कुछ नहीं होने जा रहा है। ऐसा होने के स्थान पर बच्चों की एक और कैटेगरी(बाउचर वाले बच्चे) बन गई है। निजी विद्यालयों ने वाउचर वाले बच्चों के लिए एक तोड़ निकाल लिया है ,उन्होंने ऐसे बच्चों की एक अलग कक्षा बना दी है। यहाँ ये बच्चे केवल हीनता ग्रंथि के शिकार होंगे उससे अधिक उनको कुछ मिलने वाला नहीं है। किसी को यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि सबको शिक्षा और बराबरी का लक्ष्य निजी स्कूलों के भरोसे प्राप्त किया जा सकता है। बल्कि निजी विद्यालयों के चलते एक खतरा और बढ़ गया है संविधान में उल्लिखित लोकतांत्रिक व धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की निजी क्षेत्र की अनेक शिक्षण संस्थाओं ने खूब धज्जियाँ उड़ा रही हैं। शिक्षा को कटटरता, धर्मान्धता, जातिवाद, भाषाई दुराग्रह एवं क्षेत्रवाद फैलाने का माध्यम बनाया गया है। विशेष रूप से सांप्रदायिक मानसिकता को बोया और विकसित किया जा रहा है। जैसा कि प्रख्यात शिक्षाविद् अनिल सदगोपाल का मानना भी है, ’’शिक्षा के जरिए वर्ग-भेद, जाति-भेद, धार्मिक कट्टता, नस्लवाद, पितृसत्ता, सामंती व गैर-तार्किक सोच, पिछडेपन आदि विकृतियों के खिलाफ लड़ाई आगे बढ़ाने के सरोकार गौण हो रहे हैं। शिक्षा, वैश्विक बाजार की ताकतों के हाथ में वर्चस्ववाद, शोषण, सांप्रदायिकता व विषमता फैलाने का हथियार बनती जा रही है।’’

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