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अरे इस उत्तराखंड को कोई तो बचाओ !

वरिष्ठ पत्रकार योगेश भट्ट की फेसबुक वॉल से साभार

कबीरा इस प्रदेश में भांति भांति के लोग… हर किसी को तो यहां सिर्फ अपनी फिक्र है, कौन है वो जो उत्तराखंड को बचाने की बात कर रहा है ? सत्ता पक्ष, विपक्ष और जनपक्ष तीनों ही तो कटघरे में हैं। राज्य के मैदानी इलाकों में अवैध बस्तियों पर संकट आता है तो विधायक सड़क पर उतर आते हैं । तब वे यह नहीं देखते कि कौन सत्ता पक्ष है और कौन विपक्ष । आखिरकार सरकार को अवैध बस्तियों को बचाने के लिए एक अध्यादेश लाना पड़ता है । उच्च न्यायालय के आदेश पर नजूल की जमीनों से कब्जे हटाने की कवायद होती है तो स्थानीय विधायक ‘दीवार’ बन जाते हैं । विधायकी छोड़ने तक का एलान हो जाता है । सरकार फिर दबाव में आती है और उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में अपील करने का फैसला करती है ।

आंदोलनकारियों के आरक्षण, पेंशन और सुविधाओं पर संकट आता है तो राज्य के ज्वलंत मुद्दों पर निष्क्रिय रहने वाले आंदोलनकारी भी ‘हुंकार’ भर उठते हैं । लेकिन विडंबना देखिए इसी प्रदेश में जब पहाड़ की जमीनों का सौदा करने के लिए कानून में संशोधन किया जाता है, तो सत्ता पक्ष छोड़िये विपक्ष तक के विधायक ‘जनता की आवाज’ नहीं बनते । राज्य के आंदोलनकारियों के एजेंडे में भी पहाड़ की जमीनों का सवाल शामिल नहीं होता। पहाड़ की राजधानी पहाड़ में गैरसैण की मांग तो करते हैं, लेकिन यह सवाल नहीं उठता कि जमीन ही नहीं बचेगी तो पहाड़ कैसे बचेगा ? बात बात पर हंगामा खड़ा करने वाले भी ‘मौन’ साध लेते हैं ।

विपक्षी कांग्रेस कह सकती है कि उसने सदन में विरोध किया, तो यहां यह साफ करना भी जरूरी है कि कांग्रेस ने जो किया उसे विरोध नहीं ‘रस्म अदायगी’ या ‘फेस सेविंग’ कहते हैं । दूसरे शब्दों में इसे ‘आंख में धूल झौंकना’ भी कहा जाता है । विपक्षी कांग्रेस या पहाड़ के विधायक ही ईमानदार होते तो वे सरकार पर प्रभावी दबाव बना सकते थे । कह सकते थे कि जब सरकार अवैध बस्तियों के मुद्दे पर पीछे हट सकती है, लोकायुक्त विधेयक लटका सकती है तो उत्तराखंड के भविष्य के लिए खतरा बनने जा रहे कानून को क्यों नहीं रोक सकती ?

हाल ही में पहाड़ पर कृषि भूमि की खरीद फरोख्त आसान करने उसकी सीमा समाप्त करने का जो फैसला सरकार ने लिया उससे सरकार की सोच और रुख काफी कुछ साफ हो गया है । अब इसमें कोई संदेह नहीं है कि सत्ता प्रतिष्ठान इस वक्त पूरी तरह ‘संवेदनहीन’ और ‘बेपरवाह’ है । सरकार को न कोई चिंता, भय है और न किसी की परवाह । परवाह होती तो भूमिहीनों और विस्थापितों के लिए आवंटित जमीन को किसी उद्योगपति को देने की दुस्साहस नहीं करती । राज्य की चिंता होती तो सीधे राज्य के अस्तित्व से जुड़े प्रश्न पर फैसला लेने से पहले सरकार कम से कम उसके संभावित दुष्प्रभावों पर भी विचार जरूर करती । आश्चर्य यह है कि सरकार ने यह फैसला ऐसे वक्त में लिया है, जब भू कानून को और कड़ा किये जाने की जरूरत महसूस की जा रही थी ।

बेहतर होता कि सरकार उद्योगपतियों के लिए रेड कार्पेट बिछाने से पहले प्रदेश में जमीनों का बंदोबस्त कराने का फैसला लेती, अपना लैंड बैंक तैयार करती । जमीनी मामलों के जानकारों के मुताबिक कायदे से हर बीस साल में भूमि बंदोबस्त होना चाहिए, लेकिन यहां पिछले लगभग साठ साल से भूमि बंदोबस्त नहीं हुआ है। अलग राज्य बना तो भी इसकी जरूरत नहीं समझी गयी, जबकि अलग राज्य की पहली आवश्यकता भूमि प्रबंधन ही थी। बंदोबस्त नहीं हुआ तो जमीनों की वास्तविक स्थिति की जानकारी भी नहीं हो पायी । नतीजा हर तरह के विकास की कीमत कृषि भूमि ने ही चुकायी । दुर्भाग्य यह रहा कि सरकारों ने भी आज तक कोई भी नीति जमीनों को बचाने की नहीं बनायी, जो नीतियां बनी वह सिर्फ लुटाने के लिए ही बनीं ।

राज्य में कृषि भूमि और किसान दोनो की असलियत भयावह है । राज्य बनने से अब तक सवा लाख हैक्टेअर कृषि भूमि खत्म हो चुकी है, ऐसा सरकार खुद अपने आंकड़ों में स्वीकारती है । प्रदेश में कुल कृषि भूमि का आधा हिस्सा तो मात्र दस फीसदी किसानों के पास है, अंदाजा लगाया जा सकता है कि नब्बे फीसदी किसानों की स्थिति क्या होगी । सच्चाई यह है कि राज्य में औसत कृषि जोत प्रति परिवार एक हैक्टेअर भी नहीं, राज्य के 65 फीसदी से अधिक परिवारों के पास एक हैक्टेअर से कम जमीन है। जहां खेती की संभावनाएं थोड़ा जिंदा भी हैं वहां हाल यह है कि एक खेत पर परिवार के ही चार लोग खेती कर रहे हैं । अच्छा होता कि सरकार चकबंदी के लिए कानून लाती, इसके लिए नियमों को लचीला करती । सीलिंग को खत्म करने के बजाय उसकी सीमा घटाकर भूमि के असंतुलन ठीक करने का प्रयास करती ।

होना तो यह चाहिए था कि राज्य सरकार सख्ती के साथ कृषि भूमि के गैर कृषि उपयोग पर रोक लगाती । नए सिरे से जमीनों का बंदोबस्त कर प्रत्येक जिले में कृषि के लिए भूमि का निश्चित प्रतिशत अनिवार्य करती । विकास संबंधी योजनाओं आदि के लिए अलग से लैंड बैंक तैयार करती । पहाड़ पर कृषि विविधिकरण और बागवानी पर जोर देती । लेकिन जो हो रहा है वह न राज्य हित में है और न राज्य की जनता के हित में है । जनता की चुनी सरकारों का छल देखिए वर्षों से मौत के मुहाने पर खड़े 375 गांवों के विस्थापन के लिए वह सालों से सरकार जमीन की व्यवस्था नहीं कर पायी है । रुद्रपुर जिले में किच्छा स्थित खुरपिया फार्म की जो जगह अनुसूचित जाति, जनजाति के भूमिहीनों तथा विस्थापितों के पुनर्वास के लिए आवंटित की गयी थी, उस पर भी आज तक विस्थापितों व जरुरतमंदों का पुनर्वास नही हुआ । उल्टा मौजूदा सरकार ने इस जमीन में से तकरीबन 80 एकड़ जमीन सिडकुल के जरिये एक बड़े उद्योगपति को देने की पूरी तैयारी कर ली है । दुखद पहलू यह है कि सरकार के इस कारनामे का विरोध तो छोड़ खुलकर विरोध करने की हिम्मत कोई नहीं जुटा पा रहा है ।

अफसोस, पहाड़ी राज्य की विधानसभा में 71 विधायकों में से 50 विधायक पहाड़ के हैं । पचास में एक भी विधायक ऐसा नहीं जो पहाड़ की तड़प महसूस करता हो । निसंदेह एकमात्र केदारनाथ से विधायक मनोज रावत ने सदन के अंदर इस भकानून संसोधन का तथ्यात्मक विरोध किया । उनका विरोध विधानसभा की कार्यवाही में दर्ज हुआ है । इतिहास में यह तो दर्ज हो गया कि विधायक मनोज रावत इस कानून में संशोधन का विरोध किया, लेकिन सवाल यह है कि एक जनप्रतिनिधि के लिए इतना ही काफी है ? पत्रकार से जनप्रतिनिधि बने मनोज रावत का दायित्व सिर्फ इतने भर से ही तो खत्म नहीं हो जाता । विधानसभा की जिस कार्यवाही में उनका विरोध दर्ज है उसी कार्यवाही में यह भी दर्ज कि उनकी नेता और नेता विपक्ष इंदिरा ह्रदयेश तो यह कह रही हैं कि इस संशोधन में सिर्फ पहाड़ को ही क्यों शामिल किया गया हल्द्वानी और रामनगर के भाबर को शामिल क्यों नहीं किया गया ?

यह प्रमाण है कि विपक्ष इस मुद्दे पर सदन के अंदर ईमानदार नही था। विपक्ष चाहता तो इस संशोधन विधेयक को परीक्षण के लिए प्रवर समिति के पास भेजे जाने की मांग कर सकता था, जैसा कि पूर्व में लोकायुक्त और स्थानांतरण विधेयक पर हुआ । विपक्ष इस मसले पर भी वैसे ही तेवर दिखा सकता था जैसे तेवर कांग्रेस विधायक करन माहरा और एक पुलिस इंस्पेक्टर के बीच हुए ‘विवाद’ में दिखाए गए । कांग्रेस ने भू-कानून संशोधन के प्रस्ताव पर वाक आउट किया, जिसे कांग्रेस की ईमानदारी का प्रमाण कतई नहीं ठहराया जा सकता । क्यों नहीं संशोधन विधेयक पर मतदान की स्थिति लाया विपक्ष ? मतदान होता तो इस पर चर्चा होती, सवाल जवाब होते और इतिहास में एक-एक गुनहगार दर्ज होता। विधायक मनोज रावत को इस साहस का श्रेय जरूर जाता है कि उन्होंने सही बात रखने की हिम्मत की, लेकिन यह भी सच है पार्टी से ऊपर वह भी नहीं उठ पाए। यही कारण है कि आज जो सवालिया निशान पहाड़ के जनप्रतिनिधियों पर लगा है, उससे वह भी अछूते नहीं हैं ।

बहरहाल कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक प्रचंड बहुमत की सरकार में भी सरकार नीतियां प्रदेश की आवश्यकता, उसके भविष्य और आम आदमी को केंद्र में रखकर नहीं बनाती । नीतियां व्यक्ति विशेष, संस्था विशेष, उद्योगपति विशेष के हितों को देखते हुए तय की जाती हैं । जिस सरकार को जनता बड़े भरोसे के साथ चुनती है, उस सरकार को फिक्र जनता से ज्यादा अपनों का धंधा जमाने की, सवा लाख करोड़ रुपये के निवेश की और बड़े उद्योगपतियों को रेड कार्पेट बिछाने की है । सरकार ही क्यों मौजूदा हालात में तो विपक्ष और जनपक्ष भी अपनी जिम्मेदारियों पर खरा नहीं उतरे हैं । ऐसे में सवाल फिर वही कि कौन बचाएगा इस उत्तराखंड को ?

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