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भवाली सेनिटोरियम की बदहाल हालत : कभी चर्चे थे आबादी के अब बर्बादी के मंजर

वरिष्ठ पत्रकार चन्द्रशेखर जोशी की फेसबुक वॉल से साभार

1934 में जब कमला नेहरू को क्षय रोग हो गया तो उनको भवाली सेनिटोरियम में भर्ती किया गया, तब जवाहर लाल नेहरू नैनी जेल में बंद थे। एक साल बाद जर्मनी के वेडेनवाइलर में उपचार के दौरान कमला नेहरू की मौत हो गई। आजादी के बाद मल्ला रामगढ़ में देश के नामी उद्योगपति सिंधिया ने एक बागान खरीदा और शानदार हवेली बनाई। कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर भीमताल से महादेवी वर्मा, रविंद्रनाथ टैगोर की यादें जुड़ी हैं। महान बौद्ध सम्राट देवानां प्रिय अशोक को भी पर्वतीय इलाके बेहद पसंद थे। अशोक के काल में पहाड़ों में विशाल मठ और शिलालेख बने। आठवीं सदी के अंत में एक अद्भुत नव युवक संत भी दक्षिण से केदारनाथ तक पहुंचा। शंकराचार्य ने यहां मठ बना कर धर्म के बुद्धिवादी रूप शैव मत का प्रचार किया। कुछ समय बाद बौद्ध मठों को देवालय और शिवालय कहा जाने लगा। खैर, जब पहाड़ संपन्न थे तो मशहूर हस्तियां, ज्ञानी, ध्यानी, विज्ञानी यहां सब आए और ठहरे भी।
…जब मूल निवासी उजाड़ दिए जाएंगे तो बाहरी लोग भी उस धरती पर ज्यादा देर नहीं टिक पाएंगे। पहाड़ों को प्राकृतिक अस्पताल भी कहा गया है। जब दुनिया में टीबी रोग का इलाज नहीं था तो अंग्रेजों ने नैनीताल जिले में भवाली के पास सेनिटोरियम अस्पताल बनाया। यहां देश और दुनिया के मरीजों का इलाज किया जाता था। आजादी से कुछ समय पहले क्षय रोग की दवा का पहला मानव परीक्षण भी यहीं हुआ था। बताते हैं एक गरीब बालक इसी अस्पताल में टीबी की बीमारी से पीड़त था। चिकित्सकों ने उसी बालक पर टीबी की दवा का परीक्षण किया। यह परीक्षण सफल हुआ और बालक स्वस्थ हो गया। बाद में वही बालक युवा बना और प्रबुद्ध बना। कुछ ही सालों पहले वह एक विश्वविद्यालय के कुलपति से रिटायर हुए। अब यह ऐतिहसिक सेनिटोरियम बर्बाद हो चुका है। न चिकित्सक हैं, न कर्मचारी हैं और पुराने भवन भी खंडहर में बदलने लगे हैं।
…विशालकाय भूभाग वाला यह ठंडा इलाका फलों के लिए मशहूर था। फलपट्टी के खेत सब्जी और अनाज के लिए भी जाने जाते थे। यह देख देश के बड़े उद्योगपतियों ने भी यहां का रुख किया। सिंधिया ने बहुत बड़ा इलाका खरीद लिया। यहां रहने के लिए भव्य हवेली भी बनाई। जब फलपट्टी का विकास नहीं हुआ तो छोटे किसान-बागवान बर्बाद होते चले गए। बाद में बड़े बगीचे भी खत्म हो गए, अब सिंधिया का बागान और हवेली बंजर पड़े हैं। टाटा ने भी यहां व्यवसाय करने की कोशिशें कीं, लेकिन सफलता नहीं मिली। शांत पर्वतीय इलाकों को शिक्षा और ज्ञान के लिए मुफीद माना जाता रहा। देश-दुनिया के समझदार ज्ञानी लोग समय निकाल कर पहाड़ों का रुख करते थे। बताते हैं रविंद्रनाथ टैगोर ने अपनी कृति गीतांजलि को यहीं पूरा किया था। महादेवी वर्मा यहां आती रहीं। उनके बाद कुछ संस्थाओं ने महादेवी वर्मा सृजन पीठ की स्थापना की, लेकिन यह अपने उद्देश्य पूरे नहीं कर पाए।
…पुरातन काल से चिकित्सा विज्ञानियों का कहना था कि हिमालयी क्षेत्र प्राकृतिक चिकित्सालय हैं। यहां कई बीमारियां शरीर के पास फटकती तक नहीं और कई बीमारियां इन इलाकों में पहुंचते ही सही हो जाती हैं। विज्ञानियों की सोच सही राह पर आगे बढ़ती तो देश के सबसे बड़े मेडिकल कालेज पहाड़ों की सुंदर आबोहवा के बीच खोले जाते। गंभीर बीमारियों को ठीक करने के लिए बड़े अस्पताल भी यहीं बनाए जाते। उच्च ज्ञान-विज्ञान की पढ़ाई के लिए बड़े कालेज पहाड़ों पर ही स्थापित होते। इन कालेजों में पढ़ने वाले बच्चों को प्रकृति बहुत कुछ सिखा देती। यहां शोध के लिए भी अपार संभावनाएं हैं। दुनियाभर के जिज्ञासु यहां पहुंच कर तकनीक और ज्ञान को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकते थे। जैव विविधता से भरे हिमालयी क्षेत्र में देशभर के बच्चे पढ़ाई करने पहुंचते तो उनके दिमाग के कई पट खुल जाते।
…हुआ इसके एकदम उलट। विज्ञानियों की सोच को शहरीकरण ने खत्म कर दिया। सरकारी नीतियां ऐसी बनीं कि मैदानी भूभाग में उद्योग खुले और ज्ञान के विकास की ओर ध्यान खत्म हो गया। उद्योगों के आसपास शहर बस गए और गांव उजड़ कर घनी आबादी में समा गए। अब शहरों में लोगों का दम घुटने लगा है। धन कमा चुके कुछ लोग पहाड़ों में समय बिताने आने लगे हैं। नदी-गधेरे इनकी थकान मिटाते हैं, पहाड़ी से गिर रही पानी की धारा को यह वाटर फॉल कहते हैं। इस सोच को देख बिल्डरों ने पहाड़ों में रिजार्ट और हवेलियां तैयार कर दी हैं। कई इलाकों में गांव वालों के पीने का पानी बिल्डरों की कालोनियों की ओर मोड़ दिया गया है। मूल आबादी रोज के संकटों से हार कर घर छोड़ रही है।
…जल्द ही एक और संकट आने वाला है। सुविधाएं नहीं होंगी तो मौजमस्ती करने वालों की भी खैर नहीं है। इन रिजॉर्टों में ठहरने वाले बीमार पड़े तो इनको वहीं पर जान गंवानी पड़ेगी। नदी-गधेरों में मस्ती करने वाले गिर पड़े तो दूर अस्पताल पहुंचने तक इनके शरीर का सारा खून निकल चुका होगा और सांसें थम जाएंगी। भूस्खलन हुआ तो बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएं जमींदोज होंगी। मूल निवासियों के बंजर घरों की तरह अकूत संपदा बटोरने की हसरतें पाले बिल्डरों के भवन भी खंडहर में बदल जाएंगे।

..जब तुम न हुए, जब हम न हुए तो क्या खाक लुटेरे घर आबाद करेंगे..

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