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चितई ग्वेल देवता (chitai gwel devta ) की महिमा

chitai gwel devta

Glory of chitai gwel devta

उत्तराखण्डी समाज अपनी संस्कृति, सभ्यता और परम्पराओं के लिए जाना जाता है। यहां का समाज आज भी कानून से अधिक अपनी लोक संस्कृति और सामाजिक मान्यताओं से संचालित होता है। न्याय के देवता के रूप में उत्तराखण्ड विशेषकर कुमाऊॅ मण्डल में पूजे जाने वाले ग्वल देवता (chitai gwel devta) जो गोलू देवता के नाम से भी जाने जाते हैं।

वैसे तो चंपावत से लेकर अल्मोड़ा तक विभिन्न स्थानों पर इनके मंदिर है। अल्मोड़ा से 6 किमी दूरी पर स्थित चितई ग्वल मंदिर (chitai gwel devta) देश दुनिया में विख्यात है।

चितई पंत गांव में बसा यह मंदिर अत्यंत प्राचीन है। गुजरात से यहां दवा व्यवसाय करने पहुंचे पंतों के पूर्वजों ने स्वप्न के आधर पर इस मंदिर का निर्माण करवाया। हिमांचल प्रदेश में मंशा देवी मंदिर की तर्ज पर यहां भी लाखों की संख्या में श्रद्धालु प्रतिवर्ष आते हैं। क्षत्रिय समाज के अराध्य ग्वल देवता को अब सभी वर्गो के लोग मानने और पूजने लगे हैं।

मान्यता है कि एक पराक्रमी, न्यायप्रिय और साहसी राजा के रूप में ग्वेल देवता (chitai gwel devta) ने यहां से नेपाल तक अन्याय और अत्याचार को समाप्त करने तथा हर जरूरत मंद के लिए मसीहा के रूप में कार्य किया। अपनी इसी छवि के कारण वे लोगों के बीच पूज्य हो गये।


कुमाऊॅ के लोक देवता के रूप में पूजे जाने वाले ग्वल देवता (chitai gwel devta) को गोलू, गैल्ल,चौघानी गोरिया, गोरिल आदि अनेक नामों से जाना जाता है। बौरारो पटटी के चौड़, भीमताल के निकट घोड़ाखाल, गरूड़, भनारी गांव, बसौट गांव, गागरीगोल, रानीबाग सहित अनेक स्थानों पर इनके मंदिर है।

चंपावत स्थित गोल्ल चौड़ का मंदिर इनका मूल मंदिर माना जाता है। जनगीतों, जागर, व कहावतों में गोलू की श्रुति की जाती है ओर उन्हें घर-घर पूजा जाता है।

मान्यता है कि चंपावत के राजा हलराई के पौत्रा और झलराई के पुत्र की पैदाईश के पीछे षड़यंत्र किया गया।

कथाकारों के अनुसार राजा की सात रानियों से संतान न होने पर आठवीं रानी से जब ग्वल (chitai gwel devta) पैदा हुए तो अन्य रानियों ने ईष्यावश उन्हें पैदा होते ही बक्से में डाल पानी में बहा दिया। आठवीं रानी की आंखों में पटटी बांध्कर उसे यह बताया गया कि तूने सिलबटटे को जन्म दिया है। बहाया गया नवजात शिशु एक निःसंतान धीवर के जाल में फंस गया और उसने उसे पाला।

तेजस्वी बालक ने जब कुछ बड़ा होने पर धीवर से जब घोड़ा मांगा तो उसने लकड़ी का घोड़ा उसे पकड़ा दिया। एक बार वह बालक उस लकड़ी के घोड़े को लेकर पानी पिलाने नदी तट पहुंचा,वहां राजा से उसकी मुलाकात हुई तो राजा ने उससे पूछा कि लकड़ी का घोड़ा भी पानी पीता है? एैसे में ग्वेल ने जवाब दिया कि जब रानी सिलबटटा पैदा कर सकती है तो लकड़ी का घोड़ा भी पानी पी सकता है।

इस बात से ग्वेल (chitai gwel devta)के जन्म का राज खुला और राजा ने उसे पुत्र के रूप में स्वीकार किया। एक जनप्रिय,उदार और पराक्रमी राजा के रूप में ग्वेल कुमाऊॅ के गांव गांव तक विख्यात हो गये।

मान्यता है कि किसी भी प्रकार के अन्याय,उपेक्षा और पीड़ा में श्रद्धालु अपनी मन्नत वहां लिख कर टांग आता है। न्याय देवता के रूप में विख्यात गोलू देवता (chitai gwel devta) उसकी मन्नत जरूर पूरी करते है।

Chitai gwel dewta

आज आदमी तो दूर अनेकों बार हड़ताली कर्मचारी संगठन भी अपनी मांगों को यहां टांगकर न्याय की गुहार लगाते हैं। उत्तराखण्ड में वनों को बचाने के लिए तमाम उपायों में स्वयं को विफल पाते हुए वन विभाग ने स्वयं वनों को ग्वेल देवता को समर्पित किया हैं।

मान्यता है कि एक पराक्रमी, न्यायप्रिय और साहसी राजा के रूप में ग्वेल देवता (chitai gwel devta)ने यहां से नेपाल तक अन्याय और अत्याचार को समाप्त करने तथा हर जरूरत मंद के लिए मसीहा के रूप में कार्य किया। अपनी इसी छवि के कारण वे लोगों के बीच पूज्य हो गये।

एसएसबी सहित अनेक संगठनों ने समय समय पर इस मंदिर (chitai gwel devta) के जीर्णोधार और सौदर्यीकरण का कार्य भी करवाया है। धीरे-धीरे  प्रदेश सरकार की इसका महत्व समझने लगी है। राज्य सरकार द्वारा यहां महोत्सव भी करवाया गया है।

वर्तमान में गायत्री परिवार सहित अनेक संगठन यहां से ब​लि प्रथा को समाप्त करने को आंदोलन भी संचालित कर रहे हैं। अल्मोड़ा,पिथौरागढ़,राजमार्ग में स्थित इस मंदिर में लाखों लोगों की अटूट आस्था और विश्वास है। इसी के निकट डाना गोलू का भी मंदिर है। एक पर्यटन और धार्मिक स्थल दोनों के रूप में इस स्थान को महत्व आऐ दिन बढ़ता जा रहा है।

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Newsdesk Uttranews

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