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दो फसक एक चहा ….

  • अनिल कार्की

 

‘चहा बेचना’ कितना वाजिफ पद है इस समय देश में. उधर गोलू मंदिर चितई के दो मोड़ बाद सीराड़ बैंड आता है जहाँ से एक सड़क सीधे सिराड़ को जाती है और दूसरी पिथौरागढ़ को . इसी दमसैन में पिछले छ सात माह से एक छितरे दाँतों का अधेड़ आदमी चीड़ के मोटे पेड़ पर कुछ लकड़ियों के सहारे पोलेथीन का छप्पर बना के चहा बेच रहा है. चहा बेचना अब बड़े गर्व की बात है गर्व की बात तो यह भी है कि इस समय चहा बेचने वाला हमारे देश का प्रधान सेवक भी है. अधेड़ उम्र ताम्बई रंग ओढ़ा हुआ आदमी 80 के दशक में कलाकारों की टीम का मुखिया था.हमारा मुखिया प्रधान सेवक भी कम कलाकार जो क्या है . गोपाल सिंह सिराड़ी नाम का यह आदमी उजड़ते बिखरते पहाड़ की बानगी है दिखने में सहज सरल यह आदमी पहाड़ की तरह भीतर ही भीतर खदब्दाहट के साथ जीता है . यह आदमी यह भी बताता है कि पहाड़ की समस्याएं क्या है और हमारे नीतिनियंता उसे क्या समझते हैं .
दरअसल मै आज चितई से आगे शीतलपानी प्राथमिक विद्यालय से लौट रहा था. आज पहली बार उत्तराखण्ड के लोकविद जुगलकिशोर पेटशाली जी के मेहनत से बना उत्तराखण्ड के वाद्ययन्त्रो के म्यूजियम से भी मुलाक़ात हुयी. लौटते वक्त सीराड़ बैंड पर बाइक रोक के चहा पीने को बैठ गया तो बातों ही बातों में गोपाल सिराड़ी से दोस्ती हो गयी . एक फौजी बाइक से आया पांच रुपये की नमीकन मांगी स्टील का गिलास उठा के पानी मांगने लगा, “दाज्यू लगाता हूँ एक पैक पानी दे दो हो” गोपाल सिंह सीराड़ी ने कहा सैप पुलिस वाले रोज आते है पूछने के लिए कहीं शराब तो नहीं बेचता करके . मै आपको डिपोजल गिलास दे देता हूँ वे आकार सीद्धे गिलास ही सूंघते है कुकुरों की तरह. आप डिपोजल ले लो और साईट में जाके खींच लो . सैप हम तो हुए कलाकार आदिम बस कैसे भी दो रोटी ईमानदारी की मिल जाय इन्ना ही काफी ठैरा सैप” यह सुनकर मुझसे रहा नहीं गया मैंने कहा, “चहा बेचना भी कलाकारी हुयी क्या?” उसने कहा नहीं नहीं सैप सच्च में पहले हमारी टीम थी वो भी रजिस्टर्ड 25 साल काम किया झौड़ा,चांचरी,गीत,बैर अपने पहाड़ की संस्कृति के लिए पर फ़ैदा कुच्छ नी हुआ 2013 में सब खत्म कर दिया. पेमेंट में आयोजक महीनों लगा देते थे. पैसे देने ले लिए पेन कार्ड मांगते थे मेरे पास था नहीं. बहुत बबाल हो गया. 20 लोगों की टीम टूट गयी . उत्तराखण्ड बनने के बाद जो ज्यादा दिक्कत आई हो सैप. सांस्कृतिक टीम को . जब टीम थी तब देश में खूब घूमे . जुगल किशोर पेटशाली तो गुरु लोग हुए हमारे.
 
मैंने कहा तो रोजगार का साधन क्या हुआ ये चहा की दुकान खोले तो आपको 7 ही महीने हुए है ? अरे सैप क्या बताऊँ जमीन है बगीचा है फल, ओख्ख्ड़ सब बानर खा देते हैं साग सब्जी बोता हूँ तो सुवर खा जाता है . बहुत आर्थिक तंगी हो गयी थी. जवान बेटा गलत सोबत में था शराब पी पी के एक दिन उपर चला गया. उसकी एक नातिनी है , बहु दूसरे के चली गयी जवान ठैरी सहारा तो चाहिए ही सबको. उसकी नातिनी है, तीन बेटियां मेरी है उनकी शादी अपने जैसे गरीब लोग ढूंढ के कर दी है . बस अपने ही कमा खाने की थोड़ा कमी सी हो गयी थी. रात-रात भर नींद नहीं आती थी. एक दिन सुबह उठ के बाजार गया लाला से सात सौ रुपये का सामान लाया और चहा बेचने लग गया. अब ठीक चल रहा है हर दिन 100 रुपये कमा लेता हूँ. कलाकार आदमी ठैरा और क्या चहिये ईमानदारी का कमाता हूँ बेमानी का नहीं . मैंने कहा अच्छा हुआ पर यह जमीन तो सड़क वालों की हुयी फिर किसी दिन उन्होंने हटा दिया तो ? कुछ देर खामोश रहके बोला, अरे सैप हाथ जोडूंगा फिर भी नहीं माने तो दुकान को पर-पर खिसका दूंगा वैसे भी पन्नी ही तो हटानी है . दुकान का सामान रोज यहाँ से घर ले जाता हूँ ढो के , पानी भी घर से ही लाता हूँ जिस दिन पानी खत्म हो गया दुकानदारी खत्म हो जाती है. इतनी दूर घर जाकर पानी लाना मुश्किल है जरा. मैंने पूछा नातिनी कितने में पढ़ती है ? गोपाल सिंह ने कहा , दो में. मैंने पूछा सरकारी स्कूल में ? गोपाल सिंह बोला, “सैप अब तो प्रायमर स्कूल भौति सुधर गये है. सब कुछ फ्री फ्री में चल रहा है किताब, लत्ता, कपड़ा, भात दाल, सब मिलता है वहाँ मास्टर भी अच्छे है.
आगे मैं क्या बोलता मैंने बात बदल दी मैंने कहा कि आप बाहर क्यों नहीं गये प्राइवेट में नोकरी करने आप तो इतना जानते हो कमा ही लेते बढ़िया, अरे सैप बाहर के लोग यहाँ आकर कमा खा रे मैंने सोचा मैं भी यही अपनी जलमभूमि में ही कमा खाऊंगा. ऐसा ही ठैरा सैप इन्सान की जिन्दगी में दुःख ही दुःख ठैरे पर दुनियादारी तो निभानी पड़ेगी . फिर कुछ गंभीर सा हो गया गोपाल सिंह बोला कि वैसे यहाँ पर भौत पहले मेरे बूबू (दादा) जब बच्चे थे वे चहा बेचते थे . इस जगह पर अंग्रेज अपने हाथी बांधते थे इसलिए इसका दूसरा नाम हथसांगड़ भी है. बाद में गौरा साहब उनको अपने साथ अल्मोड़ा बंगले में ले गया और माली का काम दिया. बातें तो बहुत कि पर यह अंश ही याद रहे. लौटते हुए मै मन ही मन सोच रहा था तीन पीढियों के बाद भी गोपाल सिंह के लिए क्या बदल गया है ? बल्कि जो था वह भी लुट गया है . कहीं सड़क विभाग का काला साहब किसी दिन सनक में आ गया तो उसकी यह पौलेथीन वाली छानी भी न छीन जाय . 
बड़ी बात नहीं कर रहा ….बस इतना कहना है उस तरफ जाओ तो एक चाय दो फसक जरुर गोपाल दा के साथ लगा लेना कलाकार आदमी है कलाकार आदमी भौत अलग होता है यार ………बस इतना ही कहना था . वैसे तो एक फसकिया कलाकार को आप रोज समाचार चैनलों और अखबारों में झेलते ही हो पर ऐसे फसकिया नकटे कलाकार हमारे गोपाल दा पर हज़ार न्योछावर ठैरे …

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