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फेसबुक का अर्थशास्त्र भाग 14

दिल्ली बेस्ड पत्रकार दिलीप खान का फेसबुक के बारे में लिखा गया लेख काफी लम्बा है और इसे हम किश्तों में प्रकाशित कर रहे है पेश है चौदहवा भाग

तीन कदम आगे और एक कदम पीछे

मार्क ने यूजर्स को खुली जगह दी है। उन्होंने शिकवा-शिकायत को दबाया नहीं है। हालांकि यह एक तरह की उनकी व्यावसायिक कूटनीति है और वे जानते हैं कि इंटरनेट की दुनिया दब्बू दुनिया नहीं है और जिस दिन यूजर्स को परेशानी महसूस होने लगेगी उसी दिन से फेसबुक नामक संस्था का पतन शुरू हो जाएगा। इसलिए जब फेसबुक पर विज्ञापन से लोग आजिज आ गए, तो फेसबुक पर ही फेसबुक के विरोध में पेज बना दिया। इन पेजों की संख्या लगातार बढ़ती गई तो जकरबर्ग ने सोचा कि सामाजिक मंच है, माफी मांग लेनी चाहिए। उन्होंने मांगी। फेसबुक बीकन एप के जरिए उन्होंने ऐसा किया।

 

 

मार्क ने रुसी क्रांतिकारी लेनिन की तर्ज पर कहा कि हम तीन कदम आगे और एक कदम पीछे की रणनीति पर काम कर रहे हैं। लोगों ने अपना काम जारी रखा। फेसबुक स्टॉप इनवेडिंग माई प्राइवेसी जैसे पेज बने। मार्क ने इन दिक्कतों का हल ढूंढा और बिना घाटा सहे जिस हद तक लोगों की आजादी और निजता को विस्तार दिया जा सकता था, उन्होंने दिया। असल में वो व्यावसायिक धंधे में भी कहीं ज्यादा चैकस और संवेदनशील हैं। देश, समाज, राजनीति से लेकर अर्थनीति तक को वो समझते हैं और समझने की कोशिश करते हैं। यह वर्ष 2009 था और मार्क ने इस समूचे साल टाई पहनने का फैसला लिया था। 2009 के ही किसी दिन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा मंदी, अर्थव्यवस्था, कटौती, रक्षा बजट, पेंटागन और शिक्षा जैसे गंभीर मसले पर बोल रहे थे। यूं कहिए कि जवाब दे रहे थे और जो व्यक्ति सवाल कर रहा था उनका नाम था, मार्क जकरबर्ग। दोनों एक ही रंग के जैकेट और टाई में थे। मंदी को लेकर जकरबर्ग ने ओबामा से जो सवाल किए वो खांटी पत्रकारों वाले सवाल थे। अंत में ओबामा ने मजाकिया लहजे में मार्क से कहा कि आप और हम जैसे लोग अगर टैक्स जमा करें तो अर्थव्यवस्था पटरी पर आ जाएगी। इस पूरे कार्यक्रम को ओबामा ने अपनी सफाई के मंच के तौर पर इस्तेमाल किया। आप समझ सकते हैं कि अमेरिका में फेसबुक और मार्क की लोकप्रियता कितनी है ……………………………………………………… जारी

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