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Facebook का अर्थशास्त्र भाग 6

दिल्ली बेस्ड पत्रकार दिलीप खान का फेसबुक के बारे में लिखा गया लेख काफी लम्बा है और इसे हम किश्तों में प्रकाशित कर रहे है पेश है छठवा भाग

मार्क को अब लगने लगा कि फेसबुक के वास्ते हॉर्वर्ड का वह कमरा छोटा पड़ रहा है। फेसबुक में उन्होंने एक सुनहरा भविष्य देख लिया था। अपने नजदीकी दोस्तों से वो बार-बार कहते कि फेसबुक का काम अब पार्ट टाइम से नहीं चलेगा। एक दिन सुबह जब वो जगे तो नए फैसले के साथ जगे।

उन्होंने तय कर लिया कि अब हॉर्वर्ड को अलविदा कहने का समय आ गया है। सो, बीच में उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी। वाशिंगटन के इस विख्यात विश्वविद्यालय से निकलकर उन्होंने सिलिकन वैली का रुख किया।

इस समय तक मार्क के पास फेसबुक का विराट स्वप्न था, महीनों की मेहनत थी, लगन था, सिर्फ एक चीज नहीं थी और वो था- धन। जून 2004 में फेसबुक का बोरिया-बिस्तर समेटकर जकरबर्ग पालो ऑल्टो, कैलिफॉर्निया चले गए। अब मार्क, मोस्कोविच, सैवेरिन और ह्यूग ने एकसूत्रीय एजेंडे पर काम करना शुरू किया।

सवेरे-सवेरे ये लोग सिलिकन वैली में एक अदद निवेशक की तलाश में धूल फांकने निकल पड़ते। मार्क की जिद थी कि कोई विश्वसनीय और बाजार को समझने वाला निवेशक चाहिए। जून में ही पे-पल के सह-संस्थापक पीटर थील की तरफ से मार्क को पहला निवेशक मिला। लेकिन मार्क ने दूसरे निवेशक की तलाश जारी रखी। जल्द ही रॉन कॉनवे से मार्क की मुलाकात हुई।

शुरुआत में कॉनवे ने मार्क को बावला लड़का समझा, जो पढ़ाई छोड़कर खामख्वाह व्यवसाय में हाथ आजमाने की कोशिश में सिलिकॉन वैली आ गया था, लेकिन मार्क की कुछ बातें उन्हें बेहद पसंद आई, खासकर उनका आत्मविश्वास। रॉन कॉनवे को मार्क ने सपाट लहजे में कहा, “आप निवेश कीजिए, मैं वादा करता हूं भविष्य में इसके 300 मिलियन यूजर्स होंगे। मैं दूंगा यूजर्स, आप दीजिए डॉलर्स।” पांच लाख डॉलर के निवेश के साथ जकरबर्ग ने एक चाइनीज रेस्त्रां के ऊपर अपना दफ्तर खोल लिया।

कुछ ही महीनों के भीतर फेसबुक ने एक मिलियन (यानी 10 लाख) यूजर्स हासिल कर लिया। फेसबुक शुरू होने के एक साल बाद यानी 2005 में फेसबुक यूजर्स की संख्या 50 लाख तक पहुंच गई। कॉनवे ने उस समय लगभग चीखते हुए कहा, “यह है असली कंपनी। हजार फीसदी की रफ्तार से तरक्की करती हुई कंपनी।”

चार चैरंगे

2004 के मध्य में जब फेसबुक नाम की कंपनी ने अपना कारोबार शुरू किया उसी समय से उद्यमी सीन पार्कर ने अपने व्यावसायिक तजुर्बे का इस्तेमाल करते हुए फेसबुक की काफी मदद की।

सिलिकॉन वैली में भी सीन पार्कर ने निवेशकों से लेकर व्यवसाय से संबंधित ज्यातार मामलों में फेसबुक की अगुवाई की। सीन पर मार्क का पूरा भरोसा था। फेसबुक ने कारोबारी जगत में तेज बढ़त बनाना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे बड़ी कंपनियों की आंखों में फेसबुक टंग गया।

उन्होंने फेसबुक की ओर तवज्जो देना चालू किया। ये कंपनियां न सिर्फ फेसबुक में निवेश करना चाहती थीं, बल्कि पूरी कंपनी को ही खरीदना चाहती थीं। 2006 में याहू ने मार्क को 1 बिलियन डॉलर (5000 करोड़ रुपए) का ऑफर दिया, जिसे मार्क ने अस्वीकार कर दिया।

मार्क के भीतर फेसबुक को लेकर जो ख्वाब पल रहा था वो अरब आंकड़े वाले डॉलर का नहीं था, वह अरब यूजर्स का था। याहू का प्रस्ताव ठुकराने के बाद एक चर्चित अमेरिकी आईटी पत्रिका ने अपनी कवर स्टोरी की दृ एक बच्चा जिसने 1 अरब डॉलर की डील ठुकरा दी! उस समय याहू के सीईओ टेरी सेमेल ने कहा- किसी 23 साल के नवयुवक से अपनी ज़िंदगी में मेरी मुलाकात नहीं हुई जो एक अरब डॉलर को यूं चुटकी में ठुकरा दें।

अब तक फेसबुक सिर्फ अमेरिकी विश्वविद्यालयों तक महदूद था। मार्क ने फेसबुक को विश्वविद्यालय की चैहद्दी से बाहर ला खड़ा किया। इस नए चरण में एप्पल और माइक्रोसॉफ्ट सहित कई कंपनियों के कर्मचारियों के वास्ते फेसबुक का दरवाजा खोला गया और अंततरू 26 सितंबर 2006 यह फैसला लिया गया कि एक अदद ई-मेल आईडी रखने वाला 13 साल या उससे ज्यादा उम्र का कोई भी व्यक्ति फेसबुक पर अपना खाता खोल सकता है।

मार्क अपने इस फैसले को तार्किक कदम कहना ज्यादा पसंद करते हैं। फेसबुक की इस घोषणा के बाद से हर रोज 50 हजार से ज्यादा लोगों ने जुड़ना शुरू कर दिया। मार्क को फेसबुक की लोकप्रियता का अंदाजा तो था, लेकिन इतने जुनूनी तरीके से लोग इसे हाथों-हाथ लेंगे इसकी उम्मीद किसी को नहीं थी। जल्द ही फेसबुक यूजर्स की संख्या करोड़ तक पहुंच गई।

माइक्रोसॉफ्ट ने अब फेसबुक को 15 बिलियन डॉलर (75000 करोड़ रुपए) का ऑफर दिया। मार्क की उम्र उस समय महज 23 साल की थी। बिल गेट्स की माइक्रोसॉफ्ट को उम्मीद थी कि जकरबर्ग इतने में पिघल जाएंगे, लेकिन जिस तरह झटके में मार्क ने याहू के प्रस्ताव को ठुकराया था, उसी तरह माइक्रोसॉफ्ट को भी बैरंग वापस भेज दिया। यह अमेरिकी व्यावसायिक हलकों के बीच एक सनसनीखेज घटना थी।

फेसबुक के एटीएम से की-बोर्ड निकलता है

फेसबुक की बढ़ती कीमत को लेकर लोगों के बीच एक उफ की भावना घर करने लगी। एक साल पहले जिस कंपनी को एक अरब डॉलर का प्रस्ताव मिला, उसके ठीक अगले साल उसी कंपनी को 15 गुना ज्यादा कीमत मिल रही थी, लेकिन कंपनी का जिद्दी संस्थापक उसे बेचने को रत्ती भर भी तैयार नहीं!कई बाजार विश्लेषक ने मार्क के कदम को उस समय बेवकूफाना करार देते हुए ये तक कह डाला कि मार्क बाजार का कच्चा खिलाड़ी है।

यह अलग बात है कि उन विश्लेषकों से स्टॉक एक्सचेंज की दुनिया के बाहर कोई नहीं जानता। मार्क कच्चा हो, पक्का हो, बाजार को कम जानता हो, ज्यादा जानता हो ये ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है तो बस वह अदद जिद्द कि अपनी कंपनी बनानी है। इस जिद्द की वजह से ही उन्होंने किसी भी कॉरपोरेट घराने का कोई प्रस्ताव मंजूर नहीं किया। उन दिनों को याद करते हुए मार्क कहते हैं कि, “सबसे आकर्षक ऑफर याहू का था क्योंकि उसी ने पहली बार अरब का आंकड़ा नजरों के सामने पेश किया था …………….. ज़ारी

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