उत्तरा न्यूज
उत्तराखंड कुछ अनकही मुद्दा

मुद्दा : कैसे बुझे जंगलो की आग

उत्तराखंड इस गर्मियों के सीजन में जंगलो में लग रही आग के कारण चर्चा में है आग लगने से वन सम्पद्दा को अरबो रूपये का तो नुकसान हुआ है साथ ही इस आग ने हजारो निरीह वन में निवास करने वाले पशु, पक्षियों को भी अपने में समाहित कर लिया है, बड़े दुःख की बात है कि हमारी गलती का खामियाजा इन निरीह प्राणियों को भी भुगतना पड़ रहा है , प्रस्तुत  रिपोर्टद जंगलो में लग रही आग की पड़ताल करते हुए समाधान का रास्ता खोजने का एक प्रयास मात्र है । 
गजेन्द्र कुमार पाठक 
पहले से ही अनियंत्रित अवैज्ञानिक दोहन की मार झेल रहे उत्तराखण्ड के जंगलों पर ग्रीष्मकाल की दावाग्नि भारी पड़ रही है। पिछले वर्ष सरकारी आंकड़ों के अनुसार माह मार्च से जंगलों में  आग लगने का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ जिससे इस बीच सरकारी आंकड़ों के अनुसार लगभग 2500 हैक्टेयर वन क्षेत्र दावानल की चपेट में आ गया है। हालांकि गैर सरकारी आंकड़े, सरकारी आंकड़ों से कहीं अधिक क्षेत्र में दावानल के चपेट में आने का दावा करते हैं। आंकड़ों की सच्चाई पर बहस हो सकती है, विवाद हो सकता है परन्तु सरकारी तथा गैर सरकारी दोनों पक्ष इस विषय पर सहमत हैं कि जंगलों की इस भीषणतम आग के लिये कम वर्षा का होना तथा चीड़ का असीमित विस्तार उत्तरदायी है। ग्रीष्मकाल की इस भीषणतम वनाग्नि ने जैव विविधता, जल स्रोत, वन्य जीव, छोटे कीड़े-मकोड़े, वन्य जीवों के आवास आदि को लीलने के साथ लाखों टन कार्बन वातावरण में छोड़ा, जिसने गर्मी की मार से बेहाल पर्वतीय भू-भाग में तापमान को बढ़ाने में सहायता की।
मई, जून की प्रचण्ड गर्मी में जब तापमान 35 डिग्री सेल्सियस  से ऊपर चला जाता हो और अचानक जंगल में आग की खबर मिले, आग की प्रचण्ड लपटें, तेज हवाओं के कारण पेड़ की जड़ से शुरू होकर क्षण भर में शाखाओं से होती हुई पेड़ के तने तक को अपनी चपेट में ले लेती हो। लकड़ी, पिरूल, घास के जलने से पैदा घनघोर धुंआ दृश्य बाधिता पैदा करने के कारण एक तरफ तो हिलना ही दूभर कर देता है दूसरी तरफ वही धुंआ सांस लेना भी मुश्किल कर दे रहा हो। आग बुझाने में किये गये श्रम से पैदा पसीना उसी आग की गरमी में सूखता रहे, पसीना पैदा होने तथा सूखने के निरन्तर क्रम से शरीर में पैदा हुई पानी की कमी से सूखे गले से आवाज निकलना तक मुश्किल हो। 80/90 डिग्री कोण पर खड़ी पहाड़ी से नीचे की ओर गिरता जलता हुआ ठीठा (चीड़ का फल) आपकी जान इस आंशका से ही सुखा देता हो कि यदि यह जलता हुआ ठीठा किसी नये क्षेत्र में गिर पड़ा तो पिछले कई घण्टों से चल रही मेहनत पर पानी फिर सकता है। यह दृश्य आजकल उत्तराखण्ड में आम है। मगर इस दृश्य का भुक्तभोगी होने के कारण कह सकता हूँ कि एक बार जंगल में आग लग जाये तो फिर उसको रोक पाना बहुत कठिन है और जब तक कि जंगल में घुसकर आग को बुझाने, उसे रोकने में सक्रिय भागीदारी न हो तब तक चीड़ के जंगलों की आग के कारणों की पड़ताल तथा उसकी रोकथाम की ठोस रणनीति बना पाना उससे ज्यादा कठिन है।
जंगलों में लगने वाली आग के मुख्य रूप से तीन कारण हैं। जनवरी-फरवरी या फिर नवम्बर-दिसम्बर के महीनों में वन विभाग द्वारा नियंत्रित फुकान (कन्ट्रोल बर्निंग) के नाम पर वनों में आग लगायी जाती है, इसका उद्देश्य ग्रीष्मकाल से पूर्व झाड़ियों तथा पेड़ों की जड़ों में अटके कूड़ा-करकट को जलाना होता है। नियंत्रित फुकान के पीछे विभागीय दृष्टिकोण जो भी रहता हो आम जनता यह समझती है कि अपनी कमियों पर पर्दा डालने के लिये जंगलात वाले खुद आग लगा रहे हैं। फरवरी-मार्च के महीनों में आमतौर पर आग गावों के नजदीक से शुरू होती है। जब ग्रामीण महिलाएं खेतों में उग आयी खरपतवार, कांटो, झाड़ियों तथा फसलों के अवशेष को सुखाकर जला देती हें। जिसे कुमाउँनी भाषा में ओण जलाना भी कहा जाता है। अधिकतर मामलों में तो महिलाएं सतर्क रहती हैं परन्तु कई बार आग को जलता छोड़कर महिलाएं अन्य कार्यों में व्यस्त हो जाती हैं। महिलाओं की इस असावधानी/लापरवाही से यह आग नजदीकी वन पंचायत/आरक्षित वन क्षेत्र से होती हुई काफी बड़े क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लेती है। अप्रैल से लेकर जून के महीने तक जंगलों में जो आग लगती है उसके कई सारे कारण हैं परन्तु एक बात सामान्य है वह है कि यह आग असामाजिक तत्वों/शराबियों द्वारा लगायी जाती है। कई बार ग्रामीण महिलाओं या जानवरों के ग्वालों द्वारा वन क्षेत्र के बीचों-बीच धूम्रपान करते समय जलती तीली फेंक देने या बीड़ी अच्छी तरह न बुझाने के कारण भी आग लगती है। कुछ-एक क्षेत्रों में अभी भी यह गलतफहमी आग लगाने को प्रोत्साहन देती है कि आग से जले क्षेत्र में अच्छी घास होती है। जलौनी लकड़ी की कमी की पूर्ति करने के लिये भी आग लगाने के मामले सामने आ रहे हैं। और अगर जनता के बीच में फैली धारणा की आधार माना जाये तो इससे भी ज्यादा गम्भीर मामला है लीसा टैण्डर की प्रतिद्वन्दिता में पीछे रह गये ठेकेदार द्वारा सफल ठेकेदार को नुकसान पहुंचाने की गरज से वनों को आग में झोंक देना ताकि लीसा गढ़ाने में प्रतिद्वन्दी को घाटा हो और अगली बार वह टैण्डर ही न डाल पाये आग लगने का यह कारण अन्य सभी कारणों से ज्यादा गम्भीर तथा हानिकारक है क्योंकि अनजाने में गलती से लगी आग पर काबू पाना तो मुमकिन है परन्तु जब कोई ठेके की प्रतिद्वन्दिता में अन्धा होकर वनों को आग में झोंकने पर ही आमादा हो तो फिर लाख कोशिशें कर ले , आग नहीं बुझ पायेगी।
दावानल के उपरोक्त वर्णित कारणों को देखते हुए इसे रोकने के उपायों को दो हिस्सों में बाँटा जा सकता है:-
1. तात्कालिक उपाय
2. दीर्घकालिक/स्थायी उपाय
तात्कालिक उपाय:
1. शीतकाल में वन विभाग की ओर से किया जाने वाला नियंत्रित फुकान बन्द किया जाये। नियंत्रित फुकान के पीछे वन विभाग के चाहे जो भी तर्क रहे हों, जमीनी सच्चाई यही है कि जिन क्षेत्रों में जाड़ों में नियंत्रित फुकान किया जाता है अकसर उन्हीं जंगलों में ग्रीष्म काल में दोबारा आग लग जाती है, क्योंकि चीड़ में पतझड़ अप्रैल के महीने में शुरू होता है।
2. जनवरी/फरवरी के महीनों में जब महिलाएं ओण इकट्ठा करती हैं और फरवरी/मार्च में इसे जलाती हैं, इस समय में ही वन विभाग और राजस्व विभाग द्वारा महिला मंगल दलों को साथ लेकर जागरूकता अभियान आरम्भ किये जायें ताकि ओण जलाते समय महिलाएं सावधानी रखें और खेतो की आग जंगलों तक नहीं पहुंचे। ग्रामवासियों की भी जिम्मेदारी होनी चाहिए कि खेतों की आग जंगलों तक न पहुंचे।
3. ग्रीष्मकाल में लगने वाली आग आमतौर पर उन रास्तों से शुरू होती है जो एक गांव को दूसरे गांव से या फिर गांव से बाजार या जंगल को जोड़ती हैं। ऐसे मुख्य रास्तों को दोनों ओर से 10 मीटर क्षेत्र को चीड़ रहित बना दिया जाना चाहिए। वन विभाग के नियमों के अनुसार भी वनों के बीच 6 मीटर चैड़ी वृक्ष रहित पट्टी, जिसे फायर लाईन कहा जाता है होनी चाहिए। यह बात अलग है कि लगभग नौ हजार कि0मी0 की फायर लाईन होनी चाहिए मगर हमारे पास मात्र ढाई हजार कि0मी0 लम्बी फायर लाईन ही है। वृक्ष/चीड़ रहित ऐसे क्षेत्र में पिरूल की मात्रा काुी कम होगी जो  भी पिरूल गिरे उसे नियमित समयान्तराल में हटाया जाये। ऐसा करने से आग लगने की संभावना काफी कम होगी यदि आग लग भी गयी तो उसे एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जाने से आसानी से रोक जा सकेगा।
4. आग लगाने वालों को पकड़ने/पहचान करने के लिये मुखबिर तन्त्र विकसित किया जाये। जी0पी0आर0एस0 जैसी उच्च विकसित तकनीकों का सहारा लेकर आग लगाने वालों पर निगाह रखी जाये।
5. वन वीटों का आकार छोटा हो। अत्यधिक बड़ी वन बीटें (लगभग 600 है0 क्षेत्रफल) वनों की निगरानी तथा सुरक्षा में सबसे बड़ी बाधा है। प्रत्येक बीट में न्यूनतम दो वनरक्षक तथा पांच फायर वाचर रखे जायें।
6. वनाग्नि से पूर्व ही फायर शमन उपकरणों, रैक इत्यादि की व्यवस्था कर ली जाये। वर्दी, जूता, टार्च, पानी की बोतल आदि वस्तुएं आग बुझाने वालों तक क्यों नहीं पहुंचती, इन कारणों का पता लगाया जाये तथा यह सुनिश्चित किया जाये कि आग बुझाने में सक्रिय प्रत्येक व्यक्ति तक ये चीजें पहुंचें।
7. आग लगने की स्थिति में जब वन कर्मी तथा ग्रामीण आग बुझाने में लगे होते हैं, वन विभाग की ओर से उन लोगों को भोजन, पानी या अन्य आवश्यक जरूरी चीजें भेजने की कोई व्यवस्था नहीं होती है। जिस कारण आग बुझाने में लगे लोग हमेशा थके, परेशान रहते हैं। द्वितीय पंक्ति के अभाव तथा भोजन पानी की कमी के कारण कई बार आग बुझाने का कार्य उस वक्त छोड़ना पड़ता है जबकि थोड़ा सा परिश्रम आग को फैलने से रोक सकता है।
8. इन सभी उपायों से महत्वपूर्ण उपाय है कि जनता को जंगलों को बाचने के लिये आगे आने के लिये प्रेरित करना होगा। ग्रामीणों को समझना तथा समझाना होगा कि यदि जंगल से लकड़ी, हल, पिरूल, घास, पानी, फर्नीचर की लकड़ी सभी कुछ मिल रहा है तो जंगलों की आग बुझाने तथा नुकसान रोकने में भी जनता की जवाबदेही बनती है। केवल ग्रामीण आवश्यकताओं की दुहाई देकर बगैर जवाबदेही के लम्बे समय तक जंगलों को जनता के रहमो-करम पर नहीं छोड़ा जा सकता है। चूंकि जंगलों से सभी को साफ हवा तथा शुद्ध पानी प्राप्त हो रहा है। अतः इन्हें बचाना सभी की जिम्मेदारी है।
स्थायी उपाय:
अब तक के इतिहास तथा अनुभवों से यह सिद्ध हो गया है कि बेशक चीड़ ने लीसा, लकड़ी, गुलिया, छिलके जैसी आर्थिक महत्व की वस्तुएं प्रदान की हैं मगर बदले में इसने हमारे मिश्रित वन, जैव विविधता, जल स्रोत तथा शुद्ध वायु भी हमसे छीने हैं। क्योंकि चीड़ की पत्तियां, जिसे पिरूल भी कहा जाता है, वनों में आग के लगने तथा फैलने का मुख्य कारण है। सरकार या जनता को माननीय सुप्रीम कोट में याचिका दायर कर चीड़ को 1980 के वन अधिनियम से हटाने की मांग करनी चाहिए। तत्पश्चात अनुमति मिलने पर ऊपर से नीचे की ओर चीड़ को हटाते हुए खाली स्थान पर चाल, खाल, गड्ढे बनाकर वर्षा जल को रोकते हुए चौड़ी पत्ती प्रजाति वृक्षों का रोपण किया जाये। चीड़ को हटाकर ही आग के खतरे से मुक्ति मिल सकती है, क्योंकि ग्रीष्मकाल में चीड़ की पत्तियां एक तरह से बारूद हैं और जब जंगलों में सर्वत्र बारूद बिछा हो तो कभी भी सुरक्षित नही माना जा सकता है। हालांकि पिरूल के व्यवसायिक उपयोग की बात भी कही जा रही है, मगर अब तक की खोजों/अनुसंधानों की सीमा को देखते हुए हय कहना मुश्किल है कि बहुत बड़े क्षेत्र में चीड़ का फैलाव, पिरूल के व्यवसायिक उपयोग को संभव बना सकेगा।
गजेन्द्र कुमार पाठकशे से फार्मासिस्ट है, और पिछले 14 वर्षो से उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के स्याही देवी क्षेत्र में जगलो को बचाने की मुहिम चला रहे है।

Related posts

अल्मोड़ा: टकोली में चल रही क्रिकेट प्रतियोगिता का समापन, पूर्व विस अध्यक्ष कुंजवाल ने खेल मैदान निर्माण के लिए की 2 लाख की घोषणा

Newsdesk Uttranews

रंगो के पर्व (Festival of colors) होली के मायने: होली का उत्सव और जीवन में रंग भरने का उत्साह

Newsdesk Uttranews

BJYM Virtual Rally: युवाओं को आत्मनिर्भर (self dependent) बना सशक्त भारत के सपने को करें साकारः ठाकुर

UTTRA NEWS DESK