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शिक्षा में सृजनशीलता का प्रश्न और मौजूदा व्यवस्था भाग 6

शिक्षा में सृजनशीलता का प्रश्न और मौजूदा व्यवस्था पर महेश चन्द्र पुनेठा का यह लेख किश्तों में प्रकाशित किया जा रह है, श्री पुनेठा मूल रूप से शिक्षक है, और रचनात्मक शिक्षक मंडल के माध्यम से शिक्षा के सवालो को उठाते रहते है । इनका आलोक प्रकाशन, इलाहाबाद द्वारा ”  भय अतल में ” नाम से एक कविता संग्रह  प्रकाशित हुआ है । श्री पुनेठा साहित्यिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों द्वारा जन चेतना के विकास कार्य में गहरी अभिरूचि रखते है । देश के अलग अलग कोने से प्रकाशित हो रही साहित्यिक पत्र पत्रिकाओ में उनके 100 से अधिक लेख, कविताए प्रकाशित हो चुके है ।
समान और सबको शिक्षा का एकमात्र विकल्प सरकारी शिक्षा
आजादी के पैंसठ से अधिक साल गुजर गए हैं। अभी तक हम न समान, न समावेशी, न मूल्यपरक और न ही सबको शिक्षा दे पाए हैं। ये लक्ष्य सार्वजनिक शिक्षा को मजबूत करके ही प्राप्त करने संभव थे, लेकिन लगातार शिक्षा का व्यवसायीकरण और निजीकरण बढ़ने से ये लक्ष्य शिक्षा संबंधी दस्तावेजों की शोभा मात्र बनकर रह गए हैं। सरकार की नीतियाँ प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से इस प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रही हैं। एक ओर सबको शिक्षा की बात और दूसरी ओर शिक्षा के व्यवसायीकरण और निजीकरण को खुली छूट, यह कैसा अंतर्विरोध है ?
आज शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य अच्छा इंसान बनाना नहीं बल्कि अच्छा वेतन पाना मात्र रह गया है। ज्ञान और उत्पादक कार्य के बीच गहरी खाई बनी हुई है। शिक्षा पूँजी के हित हो गयी है और एक ऐसे वर्ग को जन्म दे रही है, जो विचार और कार्य में पूँजी का मददगार हो। बाजार ने शिक्षा को मुनाफे का माध्यम बना लिया है। शिक्षा जन सरोकारों की अपेक्षा धन सरोकारों से जुड़ गई। स्कूल शिक्षा की दुकान और विद्यार्थी उपभोक्ता में बदल गए हंै, जिसके पास जैसे आर्थिक संसाधन हैं वह वैैसी शिक्षा खरीद रहा है। विभिन्न उपभोक्ता वस्तुओं की तरह बाजार अलग-अलग गुणवत्ता वाली शिक्षा को लेकर उपस्थित हो रहा है। कम पैसे वालों के लिए एक तरह की शिक्षा है और अधिक पैसों वालों के लिए दूसरे तरह की। ‘जिसकी आर्थिक हैसियत जैसी है, वह वैसी शिक्षा खरीद ले‘, यह बाजार का अघोषित ऐलान है। ट्यूशन या कोचिंग नए धंधे के रूप  में अस्तित्व में आया है। अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापन देकर इनसे जुड़े संस्थान विद्यार्थियों और अभिभावकों को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं। ’कुंजी‘ और ’गाइड‘ छापने वालों का धंधा खूब फल-फूल रहा है। सभी का जोर एक ही बिंदु पर है कि कैसे परीक्षा में अधिकाधिक अंक प्राप्त किए जा सकते हैं? सभी यही तरकीब बताने में लगे हुए हैं। बच्चों को सांस लेने की फुरसत नहीं है। एक अंधी दौड़ में सभी दौड़ रहे हैं। जो सफल हो गए वे अपने आप को सिकंदर समझ रहे हैं और जो पीछे रह जा रहे हैं, वे कुंठा, तनाव तथा अवसाद से ग्रस्त हो आत्महत्या कर रहे हैं या मानसिक संतुलन खो रहे हैं।
 कारपोरेट जगत की गिद्ध दृष्टि शिक्षा के व्यवसाय  पर लगी हुई है। हो भी क्यों ना! इससे उसे दोहरा लाभ है-पहला, शिक्षा में बार-बार निवेश किए बिना दीर्घकाल तक धन की प्राप्ति। दूसरा, शिक्षा में नियंत्रण के द्वारा नई पीढ़ी की मानसिकता को बाजार के अनुकूल कर अपने बाजार का निर्बाध रूप से विस्तार करना। शिक्षा में बाजार का ऐजेंडा संस्थानों के निजीकरण और व्यावसायीकरण से कहीं बड़ा है। भूमंडलीकरण का लोगों के ज्ञान को विकृत करने और औपनिवेशिक रूपाकारों के अनुकूल बनाने के रूप में इस्तेमाल किया गया है। विश्व बैंक जैसी आर्थिक संस्थाएं शिक्षा की नीतियाँ तय कर रही हैं। यह समझा जा सकता है, जब एक आर्थिक संस्था शिक्षा की नीतियों का निर्धारण करने लगेगी तो उसकी प्राथमिकता में कौनसी बातें होंगी। आज  शिक्षा में मूल्यों की बात केवल कहने भर के लिए रह गई है। मानवी मूल्य हाथी के दाँत हो चुके हैं। सामाजिक न्याय जैसे शब्द सजावट के शब्द बन गए हैं। बाजार में बिक रही  शिक्षा का मूल्यों से कुछ लेना देना नहीं है। यह विशुद्ध रूप से बाजार के अनुकूल शिक्षा है। इसका उद्देश्य अर्थ मानव तथा व्यवस्था की मशीन में फिट होने वाले पुर्जे तैयार करना है। शिक्षा की दुकानों में वही शिक्षा बेची जा रही है, जिसकी काॅरपोरेट जगत  को जरूरत है। बाजार को ऐसा मानव संसाधन चाहिए जो उसकी कंपनियों में लगी अत्याधुनिक तकनीक की मशीनों को सही ढंग से परिचालित कर सके। उसके उत्पादों को खरीदने वाले उपभोक्ताओं को मानसिक रूप से तैयार कर सके। ऐसे उत्पादों को भी बेच सके जो उपभोक्ता की आवश्यकता न हो। बाजार सोचने-समझने वाला संवेदनशील मानव नहीं चाहता। ऐसा मानव उसके किसी काम का नहीं। इसलिए आज की शिक्षा एक कुशल डाॅक्टर, इंजीनियर, प्रबंधक या प्रशासक तो तैयार कर रही है, पर उसे एक संवेदनशील इंसान नहीं बना रही है। न ही यह शिक्षा सृजनशीलता को बढ़ाने में सफल हो पा रही है। सृजनशीलता के अवसर इस बाजारवादी शिक्षा ने निगल दिए हैं। इस शिक्षा में ऐसी क्षमता नहीं है कि यह किसी को साहित्यकार, कलाकार, संगीतकार , वैज्ञानिक, दार्शनिक या चिंतक बना सके। यह उसकी न मंशा है और न ही जरूरत। यह स्वाभाविक है कि यदि शिक्षाक्रम बाजार की जरूरतों से निर्धारित होगा तो वह बाजार की जरूरतों के अनुरूप क्षमताओं और कौशलों को विकसित करने वाला ही होगा। इसका परिणाम शिक्षा के व्यापक सामाजिक आधारों, शिक्षा में चिंतन की भूमिका और संवेदनात्मक पहलुओं से दूर ले जाएगा। शिक्षा में निहित मानवीय और समाजिक तत्वों जैसे कि  समाजिक न्याय, समता और जंेडर जैसे मुद्दों, जिनकी शिक्षा में वैसे भी कम ही सराहना होती है, शिक्षा प्रक्रियाओं में पीछे चले जाएंगे। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इंसान की बुनियादी आवश्यकताओं से जुड़े मुद्दों, शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन या मानवीय समता या स्वतंत्रता को किसी भी देश में निजीकरण की प्रक्रियाएं बराबरी की तरफ नहीं ले गईं हैं ………………………………जारी

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