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शराब को इस नजर से भी देखिए जनाब

शराब के बहाने विमर्श

शंभू राणा

मशहूर व्यंगय​कार शंभू राणा का यह लेख कुछ वर्ष पुराना जरूर है। एक दशक पहले शराब दुकान को बंद कराने को लेकर गंगोलीहाट में महिलाओं की पहल पर एक जबरदस्त आंदोलन चला था और उसके बाद गंगोलीहाट में शराब की दुकान को सरकार को जन आक्रोश के कारण बंद करना पड़ा। लेकिन कुछ समय बाद शराब की दुकान को खोलने के लिये एक माहौल् बनाया जाने लगाया। उसी समय पर शंभू राणा ने यह लेख लिखा था। लेकिन एक बड़े मुददे पर लिखा यह लेख आज भी प्रासंगिक हैं।

पिछले कुछ दिनों से अखबार में एक खबर बराबर छप रही है और ध्यान खींच रही है। खबर गंगोलीहाट से है कि वहॉ लोग शराब की दुकान खुलवाने के लिए आन्दोलन कर रहे हैं। एक दिन बाजार बंद हो चुका है इसी मांग को लेकर। ये हुई न खबर कि आदमी ने कुत्ते को काट खाया। ये क्या खबर हुई कि शराब के विरोध में महिलाएं सड़को पर। ऐसी रूटीन की खबरों को आदमी पढ़े बिना ही पन्ना पलट देता है। समाचार माने कुछ नया।

उपरोक्त खबर के मुताबिक जब से गंगोलीहाट में शराब की दुकान बंद हुई है वहॉ स्मगल की हुई शराब की बाढ़-सी आ गई है। लोगों का जीना दूभर हो गया है। इलाके में तबाही के आसार नजर आने लगे हैं। तस्करों की आपसी गैंगवार में कुछ कत्ल हो सकते हैं वगैरा। यकीनन यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। यही सच होगा। शराबबंदी का यही एकमात्र साइड इफैक्ट है। शराबबंदी आन्दोलन चलाने वाले इसे या तो समझ नहीं पाते या अगर समझते हैं तो मानने में शायद उनका अहं आड़े आता है। नतीजा सामने है।

शराबबंदी आन्दोलन हिन्दुस्तान का सबसे असफल आन्दोलन है। इसकी सफलता की उम्र उतनी ही है जितनी आज-कल के हिट फिल्मी गानों की। एकाध साल पहले अल्मोड़ा के बसौली इलाके में शराब की दुकान बंद हो गई तो शराब बसौली की सरहद पर गाड़ियों में बिकने लगी। पीने वाले बस में बैठ कर जाते और शराब खरीद कर वापस चले जाते। सॉप भी जिन्दा, लाठी भी सलामत। बसौली में फिर से दुकान खुल गई। अब लोगों का 10-20 रूपये बस का किराया बचता है।

मोरारजी भाई के जमाने में देशव्यापी शराब बंदी लागू रही। मुझे नहीं पता ये कितने दिन रही। मुझे नहीं पता ये कितने दिन रही। मगर ये जानता हूॅ कि उस दौरान पियक्कड़ों ने दारू के ऐसे-ऐसे विकल्प खोज निकाले कि सुनकर अकल चकरा जाए। शरीफ आदमी दवा की दुकानों में जाने से कतराने लगा था कि कहीं नशेड़ी न समझ लिया जाए। भाई लोगों ने अपनी जान पर खेल कर पेट्रोल उबाल कर शराब बना डाली। अजब-गजब कीमियागिरी मधपों ने नशाबंदी का अहसास नहीं होने दिया। इस दौरान कुछ लोगों को एक आइडिया क्लिक कर गया। उन्होंने दवा विक्रेता का लाइसेंस ले लिया। नशावर टॉनिक बेच कर करोड़ो कमा गए। जब देश का प्रधानमंत्री शराब बंद नहीं करवा सकता है तो फिर कौन करवा सकता है?

बेशक शराब बुरी ही चीज है, पर्दे की चीज है। कोई भी ढंग का और सामाजिक सरोकार रखने वाला व्यक्ति शराब की सार्वजनिक वकालत कतई नहीं कर सकता। पीना-पिलाना एक व्यक्तिगत मामला है। वह अलग चीज है। लेकिन क्या शराब ऐसी और इतनी बुरी चीज है कि उसका समूल नाश कर दिया जाए। उसे देखने के लिए अजायबघर जाना पड़े। बेशक शराब आज की तारीख में एक बड़ी सामाजिक समस्या है। शराब से कई धर उजडे़, न जाने कितनी गृहस्थियां टूटीं, अनगिनत लोग जवानी में ही कुत्ते की मौत मर गए। शराब बंद नहीं हुई। हो भी नहीं सकती। स्वामी दयानंद सरस्वती ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में ब्रहमचर्य की जैसी व्याख्या की है वह आम आदमी के लिए मुमकिन ही नहीं। उसी तरह का नामुमकिन और अव्यावहारिक विचार शराब बंद कर देने का भी है। जहॉ कहीं भी शराबबंदी लागू हुई, वहॉ मिलावटी-नकली और धटिया शराब तस्करी से पहुॅच गई। क्योंकि वह शराब अवैध होती है, चोरी-छिपे बेची जाती है इसलिए महंगी होती है। जो कि पीने वालों के साथ-साथ उनकी जेब पर भी भारी पडती है। पहले जो थो़ड़ा-बहुत पैसा या राशन-पानी पीने वाला धर ले जाता था अब वह नहीं पहुॅचता है। नतीजन बच्चे फाके करते हैं।

तो इस समस्या का हल क्या है आखिर? किसी भी समस्या का आसान-सा हल जो कि व्यवहारिक भी हो, जरा कम ही मिल पाता है। इस समस्या का भी इलाज शायद इतना आसान न हो। ज्यादातर लोग बाकी खेलों को खेल की तरह देखतें हैं लेकिन क्रिकेट को दो देशों के बीच चल रहे युद्ध की तरह लेते हैं। नतीजे में कई बार दंगा-फसाद हो जाते हैं। कमोबेश यही बात पियक्कड़ी पर भी लागू होती है। ज्यादातर लोग शराब को जाने-समझे, उसके साथ दोस्ती किए बगैर उसे गटक जाते हैं। नतीजतन शराब पेट में बाद में पहुॅचती है दिमाग में पहले पहुॅच जाती है। पीने वाला बौरा जाता है। वह सब कर गुजरता है जो बिना पिए सोच भी नहीं सकता। हमारे यहां आदमी के सर में ज्यों ही दो लोटा पानी पड़ता है वह फौरन संस्कृत के श्लोक उगलने लगता है और दो धूॅट शराब पेट में पहुॅचते ही अंग्रेजी बोलने लगता है। असामान्य हो जाता है। ऐसे लोगों को शराब पीने की तमीज सिखाए जाने की जरूरत है। ज्यादातर पीने वालों को ‘थ्री डी’ के नियम का पता ही नहीं। यानी डाइल्यूट, ड्यूरेशन और डाइट। ऐसे लोगों को समझाए जाने की जरूरत है कि बेटा पीने का सलीका सीखो, क्वालिटी देखो क्वांटिटी नहीं। दारू पेट भरने की चीज नहीं है। जितनी ताकत और समय शराबबंदी आन्दोलन में बेकार गई उसका 50 फीसदी भी अगर मद्यपों के प्रशिक्षण में खर्च की गई होती तो स्थिति कुछ अलग होती और सकारात्मक होती।

उत्तराखण्ड में शराब के मुद्दे पर वाकई एक व्यापक आन्दोलन की जरूरत है। मगर वह आन्दोलन शराबबंदी के लिए न होकर इस बात के लिए हो कि शराब सस्ती हो, स्तरीय हो, सरकारी नियंत्रण में स्थानीय स्तर पर बने। हमारे राज्य में कई ऐसे फल हैं जो हर साल हजारों टन बेकार चले जाते हैं जबकि उनसे एक्सपोर्ट क्वालिटी की शराब बनाई जा सकती है। कागज मे थैले और बड़ी- मुंगौड़ी बना कर स्वरोजगार की बेतुकी सीख देने वाले क्यों इस बारे में नहीं सोचते। क्या यह पंचायती राज का हिस्सा नहीं हो सकता? शराबबंदी आन्दोलन चलाने वालों से इस बारे में बात करो तो वो यह कह कर दरवाजे बंद कर देते हैं कि क्या पीना इतना जरूरी है? अजी साहब, पीना तो दो कौड़ी की चीज है। जरूरी तो जीना भी नहीं जान पड़ता। ये जीना भी कोई जीना है लल्लू। जैसा जीवन इस देश में आम आदमी जी रहा है। दारू डाइल्यूट करने को साफ पानी आदमी को मिलता नहीं है। शराब हमारे समाज की एक मात्र समस्या नहीं है। और भी गम हैं जमाने में दारू के सिवा।
जिन्हें पीकर मरना है, यकीन जानिए वो पीकर ही मरेंगे। शराब बंद कर दी जाएगी तो शराब के नाम पर जहर पीकर मरेंगे। उन पर रहम कीजिए, उन्हें पीकर मर जाने दीजिए। उनका हस्त्र देखकर बाकी लोग या तो पिएंगे नहीं अगर पिएंगे तो सलीके से।

एक समय था जब चाय पीना अगर बुरा नही ंतो उतना अच्छा भी नहीं माना जाता था। बच्चों के लिए तो वर्जित ही थी। आज जो चाय नहीं पीता वह महफिल में उल्लू का पट्ठा नजर आता है। आज कोई उम्मीदवार चुनाव में मतदाता को चाय-कॉफी पिलाकर प्रभावित नहीं कर सकता। जबकि शराब पिलाकर यह काम हर चुनाव में खुलेआम होता है। शराब यदि चाय जितनी आम और महत्वहीन हो जाए तो जरा सोचिए क्या होगा? सीन देखिए नेताजी इस केतली में चढ़ी है चाय और दूसरी में दारू। आप उठाइए अपनी बोतल और दफा हो जाइए। देखो यार, दारू के बदले वोट मॉग रहा है हमसे कमीना। जैसे हमने कभी दारू पी ही नहीं….। आदाब मैकदे के तब्दील हो रहे हैं, साकी बहक रहा है मैकश संभल रहे हैं।

आज की तारीख में शराब पीना गुनाह करने जैसा हो गया है कि जिसके बाद खुद से सौ झूठ बोलने पड़ते हैं। समाज में जब तक ऐसा माहौल नहीं बनेगा कि हम शराब को चाय-कॉफी की तरह अपराधबोध महसूस किए बिना पी पाएं। शराब, शराब न होकर समस्या ही बनी रहेगी।
और जो ऐसा सोचते हैं कि शराब इतनी आम हो जाने पर आधी से ज्यादा आबादी सूरज उगने तक नालियों में लोटती नजर आएगी, तो उनका ऐसा सोचना ठीक नहीं जान पड़ता। जिस चीज को पर्दे में रखा जाएगा उसके प्रति उत्सुकता उतनी बढ़ती जाएगी। आदमी उसे पाने के लिए ताले तोड़ेगा, सेंध लगाएगा, सुरंग खोद डालेगा, छत उखाड़ देगा और तमाम गैरकानूनी काम करेगा कि देखूॅ तो सही आखिर है क्या? गणित का कोई भी सवाल तभी तक समस्या है जब तक हम उसे समझ नहीं लेते। ज्यों ही फॅारमूला हम समझ लेते हैं वह खेल हो जाता है।
मैं एक बार फिर अपनी बात साफ कर दूॅ कि मैं शराब की वकालत नहीं कर रहा। उसे महिमामंडित भी नहीं कर रहा हॅ। न मैं लोगों को पीने के लिए उकसा रहा। न ही शराब को दूध-दवा अखबार की तरह अति आवश्यकीय वस्तु साबित करने में लगा हॅू। मैं कोई नई बात भी नहीं कह रहा हॅू। मैं सिर्फ दो-तीन बातें कह रहा हॅू कि शराब बंद किसी भी सूरत में नहीं हो सकती। और पीने वाले हर हाल में कुछ भी जतन करके पी ही लेंगे। उन्हें रोका नहीं जा सकता। और जो नहीं पीते, वे शराब पीना कानूनन अनिवार्य कर दिए जाने पर भी नहीं पिएंगे। भले ही जुर्माना भरना पड़े या जेल जाना पड़े। शराब को लेकर हमारा आज तक जो व्यवहार रहा है, वह गलत है। अनुभव से यही साबित हुआ। व्यवहार और रणनीति बदलने की जरूरत है। यही सब मैं कहना चाह रहा हॅू।

असल बात तो यह है कि हमारा सारा ध्यान शराब पर रहा, शराबियों के बारे में किसी ने सोचा ही नहीं। भाई लोग शराब-शराब चिल्लाते रहे, पीने वाले पीते रहे। चोर अक्सर उस भीड़ में शामिल हो जाते हैं जो उन्हें पकड़ने के लिए भाग रही होती है। ऐसा चोर क
भी नहीं पकड़ा जाता। समस्या शराब न होकर पीने वाले हैं। इस नजरये से हमने कभी सोचा ही नहीं। शराबबंदी आन्दोलन कभी वास्तविक मुद्दे पर केन्द्रित हो ही नहीं पाया। हम समझ ही नहीं पाए कि हिट कहॉ करना है। पीने वालों को पीने से रोका नहीं जा सकता, उन्हें समझाया और प्रशिक्षित किया जाना चाहिए कि भाई, पीने का सलीका सीखो, वर्ना स्मृति शेष होने में ज्यादा देर नहीं लगती। यम के दूत बड़े मरदूद। इस मामले में शिक्षण-प्रशिक्षण का तरीका ही कारगर हो सकता है। दारू की दुकान बंद होने से कुछ नहीं होगा। आज तक कुछ हुआ? कहॉ-कहॉ दुकान बंद करवाएंगे? भगवान सर्वव्यापी हो न हो, दारू शर्तिया है।

शराब विरोधियों की नीयत में कोई खोट नहीं, खोट उनके तरीके में है। शराब के प्रति उनका नजरिया अव्यावहारिक है। उन्होंने धोड़े को तांगे के पीछे जोत रखा है। इसलिए उनकी बग्धी एक इंच भी आगे नहीं बढ़ी। देखकर दुख होता है कि इतनी ताकत और समय यूंह ही व्यर्थ चला गया। उन्हें तय करना होगा कि वे इस मामले में असफलताजनिक कुंठा लेकर संसार से विदा होना चाहेंगे या कुछ सार्थक कर के संतोष के साथ।

बातें कुछ ज्यादा ही गंभीर हो गई लगता है। चलिए आपको एक लतीफेनुमा किस्सा सुना दूॅ। यह किस्सा कई साल पहले मुझे एक सज्जन ने सुनाया था। बकौल उनके, यह किस्सा अल्मोड़ा का है। होगा, कुछ बातें न जाने क्यों सिर्फ यहीं होती हैं! किस्सा यूॅ है कि जिलाधिकारी कार्यालय में कार्यरत एक क्लर्क एक बार अपनी कोई समस्या लेकर डीएम साहब के पास गया। डीएम साहब को क्लर्क के मुॅह से दारू का भभका आया। उन्होंने क्लर्क को डॉटा- आप डिंक करके आए है! बाबूजी ने बड़ी ही सादगी और ईमानदारी से कहा- साहब गलती माफ करें, पर मुझ जैसे मामूली आदमी के बिना पिए आप जैसे बड़े अफसर के सामने आने की हिम्मत ही नहीं होती। डीएम साहब यकीनन समझदार आदमी होंगे। सुना कि उन्होंने क्लर्क की समस्या सुलझा दी और ऑफिस टाइम में पीकर आने के लिए उन्हें कोई दंड भी नहीं दिया। सिर्फ मौखिक चेतावनी देकर छोड़ दिया।

मैं न तो बुद्धिजीवी हॅू न कोई विचारक। होना भी नहीं चाहता। बड़े ही पाजी होते हैं। एक आम आदमी जैसा होता है वैसा ही हॅू। अपनी सीमित बुद्धि और जानकारी के अनुसार कभी कुछ सूझता है तो उसे लिखने की कोशिश करता हूं। जिसके लिए अमूमन मुझे ज्यादा ही प्रशंसा मिल जाती है। एक-दो बार जूते पड़ने की भी नौबत आई मगर बच गया। छपने के बाद चीज पाठकों की हो जाती है। उन्हें कैसी ही भी प्रतिक्रिया देने का अधिकार होता है। शराब के बारे में जो जाना, देखा और अनुभव किया उसी को ईमानदारी से कह दिया। यह एक अति संवेदनशील विषय है, जिसका सिरा मैंने विपरीत दिशा से थाम लिया है। देखें इस बार क्या प्रतिक्रिया होती है! और मैं हर बार की तरह तैयार हूॅ ईनाम में शराब की बोतल पाने और स्नैक्स के रूप में जूते खाने को।

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