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विश्व वरिष्ठजन दिवस 1 अक्टूबर पर विशेष

 

पिछले साल सोशल मीडिया में कुछ दर्दनाक हादसे प्रकाश में आए। बीमार मां को छत से फेंकता इंजीनियर बेटा, सास को सिलबट्टे से कूटती बहू, बीमार मॉं को लात मारती बेटी …..

लंबा सिलसिला है। भारत में आकड़े बताते हैं कि केवल 1 प्रतिशत मामले ही प्रकाश में आते हैं। बाजार है साहब जो काम का नहीं वह किसी काम का नहीं का सिद्धांत चलता है यहां। यहां मानव को संसाधन कहा जाता है, बूढ़े कहां कमाते हैं। 1 अक्टूबर को विश्व वृद्धजन दिवस है। 1990 के बाद से दुनियां ने एक दिन विश्व के वृद्ध जनों के बारे में सोचने के लिए देना शुरू किया। 14 दिसम्बर 1990 को संयुक्त राष्ट्र संघ की आम सभा में इस प्रस्ताव को लिया गया और 1991 से दुनियां ने इसे मनाना शुरू किया। हालांकि विश्व के विभिन्न देशों में अनेकों रूपों में इस प्रकार के दिवस मनाए जाते रहे हैं।

 

यह सत्य है कि जो आज युवा है कल बूढ़ा होगा। जवानों की आबादी वाले देश कल बूढ़ों की आबादी वाले देश बनेंगे। जर्मनी और एक सीमा तक ब्रिटेन में यह समस्या देखी जा सकती है। लोक कल्याणकारी राज्यों में सरकारों से उम्मीद की जाती है कि वह समाज के हर तबके विकास व उन्नति के लिए कार्य करें।

बीते चार दशको से भारत में वृद्ध जनां की आबादी में गुणांत्मक परिवर्तन देखे गए है। भारत में कमोवेश 60 वर्ष की आबादी के बाद व्यक्ति इस आयु सीमा में प्रवेश कर जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ के जनसंख्या विभाग के एक अध्ययन के अनुसार भारत में 2010 में आबादी में वृद्धजनों का प्रतिशत 7.5 था जो 2025 तक लगभग 12 और 2050 तक 19 प्रतिशत होने का अनुमान है। चीन के बाद भारत वृद्ध जनों का दूसरा बड़ा देश माना जाता है। भारत में 2025 तक अनुमान है कि आबादी के 12 प्रतिशत लोग बूढ़े होंगे वह भी तक जब सामाजिक सुरक्षा ताक पर है। पेंशन, रोजगार आदि सपना हो गए हैं।
भारत में बदलते पारिवारिक मूल्यों एवं आय से सीमित होते संसाधनों ,सामाजिक , आर्थिक चुनौतियों के बीच स्वास्थ्य व चिकित्सा सेवाओं की कमियों के कारण इस तबके का जीवन और अधिक प्रभावित होता है। सरकार मात्र 3 रूपया रोज चिकित्सा व स्वास्थ्य पर खर्च करती है। आम नागरिक को स्वास्थ्य व चिकित्सा पर 75 प्रतिशत तक खर्च भार वहन करना पड़ता है। सरकार के हिस्से 22 प्रतिशत आता है जबकि 3 प्रतिशत उद्योग जगत और दानदाताओं की ओर से खर्च होता है। एक ग्रामीण परिवार अपने खर्चों का न्यूनतम 5 प्रतिशत तक स्वास्थ्य और चिकित्सा में खर्च करता है जबकि शहरी 2 प्रतिशत। इसी प्रकार अस्वस्थ होने पर नागरिक सरकारी चिकित्सा सेवाओं की तुलना में दो गुनी बार अधिक निजी क्षेत्र में सेवाएं लेने जाता है।
श्रवण कुमार के कर्तव्यपरायण और संवेदनशीलता के सामाजिक उदाहरण वाले इस देश में वरिष्ठजन भारी उपेक्षा के शिकार है। व्यवसायिकता के इस दौर में वृद्ध जन परिवार पर बोझ प्रतीत होने लगे हैं। परिवार की चाहरदीवारी के बीच भी आज अनेक वृद्ध उपेक्षा, तनाव, मारपीट आदि का शिकार होते हैं। अध्ययन बताते हैं कि हर 10 में से 6 वृद्ध जोड़े उपेक्षा के शिकार हैं और घरों से बाहर रहने को बाध्य है। छोटे कस्बों से भी ओल्ड होम की मांग उठने लगी है। संप्रग सरकार ने 2007 में वरिष्ठ नागरिक भरण पोषण तथा कल्याण कानून बनाया। इस कानून के तहत वरिष्ठ नागरिक का परित्याग दण्डनीय अपराध है और इस कानून में तीन माह की कैद और पांच हजार रूपया दण्ड का भी प्रावधान है। यह कानून भरण पोषण के रूप में 10 हजार रूप्या प्रतिमाह देने का आदेष भी दे सकता है साथ ही 90 दिनों में इस प्रकार के मामलों का निस्तारण होना होता है। महानगरों में वृद्ध आश्रमों की बाढ़ आ रही है। धार्मिक स्थलों में भी इस प्रकार के वृद्ध भिखारियों को देखा जा सकता है। उच्च न्यायालय में विधवाओं के मामले में बैठाई गई एक समिति की रिपोर्ट के अनुसार आज देष में विभिन्न आश्रमों में बड़ी संख्या में वृद्ध दयनीय जीवन गुजार रहे हैं। सीआरपीसी की धारा 125 भी वृद्ध जनों को भरण पोशण पाने का अधिकार देती है।

बुढ़ापे का स्वास्थ्य   

पांव का दर्ज, कमजोर नजरें और मधुमेह और मानसिक तनाव रक्तचाप का बढ़ना आज भारत के बुजुर्गों की मुख्य समस्याऐं है। राष्ट्रीय अध्ययन बताते हैं कि वर्ष 2030 तक भारत में 45 प्रतिशत बीमारियां इसी तबके से सम्बंधित होंगी। सैनिक कार्यवाहियों, आतंकवादी कार्यवाहियों, व पर्वतीय मार्गों में वाहन संचालन तथा नशे की बढ़ती प्रवृत्ति के कारण औसतन प्रति गांव 20 से 30 परिवार  खासकर युवाओं की मौत से प्रभावित है। इस जटिल सामाजिक और आधुनिक विकास के बाद उपजी समस्या का सीधा प्रभाव परिवार के मुखिया पर पड़ता दिखाई देता है।

इस समस्या के विविध समाधानों की ओर जाने के साथ इन क्षेत्रों में वृद्ध जनों की समाजिक, मानसिक व आर्थिक सुरक्षा के उपचार करने के साथ उन्हें मनोवैज्ञानिक सहयोग की भी आवश्यकता है।
भारत में लगभग 30 प्रतिशत आबादी किसी न किसी रूप शारीरिक रूप से अक्षम हैं। 60 प्रतिशत के लिए उचित शौचालय की व्यवस्था नहीं है। घरेलू प्रदूषण यथा धुंए ध्वनि प्रदूषण संकुचित कमरों आदि में रहने को बाध्य हैं ।

जीवन व्यवस्था एवं सामाजिक सहयोग

भारत में पांच में से चार वृद्ध बहुपीढ़ी वाले परिवारों में रहते हैं। पिछले दशक में बच्चों की संख्या में कमी शहरी व ग्रामीण पलायन, तथा परिवार के विघटन के कारण भी वृद्ध जनों का जीवन प्रभावित होता हैं।

कार्य , सेवानिवृत्ति एवं आर्थिक सुरक्षा

भारत की 90 प्रतिशत आबादी असंगठित क्षेत्र में काम कर जीवन यापन करती है। राष्ट्रीय अध्ययन के अनुसार भारत में केवल 11 प्रतिशत वृद्ध ही पेंशन पाते हैं। आय कम व खर्च अधिक होने के कारण वे बचत भी नहीं कर पाते। परिवार व बच्चों पर निर्भर रहना उनकी बाध्यता बन जाती है।

पलायन और विस्थापन

अनेक राज्यों में बाढ़ मौसम और बॉधों के कारण भी बड़ी संख्या में लोगों में विस्थापन देखा गया है। इस विस्थापनों और पलायन की प्रक्रिया का भी वृद्ध जनों में अत्यंत कुप्रभाव देखा गया है। उचित पुनर्वास के अभाव के साथ बदलती संस्कृति, स्थान, जीवन शैली आदि को वे अंगिकार नहीं कर पाते और जीवन का बचा हिस्सा तनाव व अभाव के साथ विसंगतियों में गुजारते हैं।

वृद्ध महिलाओं की स्थिति

भारत के उत्तरी राज्यों में वृद्ध महिलाओं की स्थिति विशेष चिंताजनक है। पलायन, कृषि बहुल्य समाज और सांस्कृतिक जटिलताओं के कारण यहां महिलाएं बचपन से ही उपेक्षा का शिकार देखी जाती है। जहां भारत में मातृ मृत्युदर अधिक है वहीं कम उम्र में विवाह, सामाजिक, जातिगत, पारिवारिक आदि कारणों का भी इनके जीवन पर अत्यधिक प्रभाव देखा जाता है। वृद्ध अवस्था में प्रवेश करते ही इनके जीवन में अनेक प्रकार की समस्याएं देखी जाती है। एकाकीपन, निर्भरता, पीढ़ी अंतराल के कारण भेद जैसी समस्याओं से वृद्ध महिलाओं को ग्रसित देखा गया है। खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा व जीवन सुरक्षा से आच्छादित न होने के कारण वे उनका जीवन अत्यंत कष्टप्रद हो जाता है।

विकलांगता की दासता

भारत में 1991 से 2001 तक हर दशक में वृद्ध जनों की आबादी 1 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है  और इसमें महिलाओं की संख्या पुरुषों से 1 से 2 प्रतिशत अधिक है। भारत सरकार के सामाजिक न्याय एवं सशक्तिकरण मंत्रालय द्वारा  हिमालयी राज्यों में वृद्धजनों की स्थिति के लिए विशेष अध्ययन में विशेष उपचार की आवश्यकता दृष्टिगोचर होती है।
अकेले उत्तराखण्ड में 1लाख 94 हजार 769 से अधिक लोग किसी किसी रूप से अक्षम है। उत्तराखण्ड में 85 हजार 668 से अधिक लोग दृष्टिबाधित हैं वहीं 16749 लोग गूंगे और 15990 दृष्टिबाधित और 56474 से अधिक लोग मानसिक रूप से अस्वस्थ् है। अरूंणाचल प्रदेष में विकलांगों के बड़े प्रतिषत का अधिकतम 66.6 प्रतिशत पुरूष किसी न किसी रूप में अक्षमता का षिकार है। सरकार से क्या मिलता है, सबको पता है।
हो सके तो सरकार और समाज यह करें

ये वृद्ध जन हमारी पिछली पीढ़ी के संरक्षक थे, हम इनकी संतति हैं और मानवीय गरिमा के साथ उन्हें जीने का अधिकार है। सरकार को भी मसलन परिवार के वृद्धों के साथ रहने वाले कर्मचारियों को प्रोत्साहित करना चाहिए। सर्वप्रथम खाद्य सुरक्षा प्रणाली को दुरूस्त कर 40 की आयु पार करने के बाद समाज की मैंपिंग करनी आवश्यक है। वृद्ध स्वास्थ्य योजना बनाकर उसे लागू करने की आवश्यकता है। वृद्ध जनों के साथ होने वाले अपराधों, उपेक्षा,  दुर्घटना आदि से बचाने के लिए उन्हें ठोस संरक्षण देने की आवश्यकता है। ग्राम समाज इसके लिए उत्तरदायी बनाया जाए। निःशक्त , विकलांग, मूक व दृष्टिबाधित वृद्धों के लिए नई तकनीक का प्रयोग कर उन्हें विशेष हैल्पलाईन से जोड़ा जा सकता है। वृद्ध जनों के स्वास्थ्य की जॉच के लिए सरकार अभियान चलाए और ग्राम स्तर क्षेत्र के सभी वृद्धों के स्वास्थ्य के आकड़ों को व्यवस्थित कर उन्हें उस अनुरूप लाभ पहुंचाए। वृहद स्तर पर वरिष्ठ नागरिक भरण पोषण तथा कल्याण कानून 2007 के व्यापक प्रचार प्रसार की जरूरत है । शिक्षा , सामाजिक गतिविधियों, सृजन आदि के विभिन्न क्षेत्रों में वृद्ध जनों के स्वैच्छिक हस्तक्षेप को बढ़ाना होगा। वृद्ध जनों को सरकार प्राथमिक स्कूलों, आंगनबाड़ी, व अन्य परामर्षी कार्यो में जोड़कर उन्हें आर्थिक लाभ भी दे सकती है। वृद्ध जनों के प्रति संवेदनशीलता के लिये देश भर में गैर सरकारी संगठनों के माध्यम से समय समय पर अभियान भी छेड़े जा सकते हैं। वृद्ध जनों के साथ हिंसा अथवा उपेक्षा के लिए देष में भरण पोषण कानून के साथ वृद्ध महिलाआें के साथ उपेक्षा व हिंसा को घरेलू हिंसा कानून के दायरे में लेने की आवश्यकता है। वृद्ध समाज को सामाजिक, सुरक्षा की गारंटी के लिए सार्वजनिक क्षेत्रों यथा सरकारी कार्यालयों, रेलवे, चिकित्सालयों, पुलिस, यातायात, गैस सर्विस आदि सभी स्थानों पर अधिक संवेदनशीलता लाने के प्रयास करने होंगे। महिलाओं की भांति परिवार के मुखिया अथवा अन्य वृद्ध के नाम संपत्ति अथवा निर्णय शक्ति का होना आवश्यक है जिसके लिए कानूनी उपचार करने होंगे। भारत में संचालित वृद्ध जनों के एकीकृत कार्यक्रम (आईपीओपी इंदिरा गांधी वृद्धावस्था पेंशन (आईजीएनओएपीएस वरिष्ठ जनों के संरक्षण के लिए चलाए गए राष्ट्रीय कार्यक्रम एनपीएचसीई आदि कार्यक्रमों को और व्यापक और सुदृढ़ करने की आवश्यता है।

 

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